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प्रश्नोत्तर P23-0097 · भाग 23

गुरु जी, आपने अभी शब्द बोला था कि मालिक बनने के चक्कर में उस मालिक से दूर हुए। यह मालिकपन का भाव कहीं पहले जन्म से तो आया होगा ना? यह इतना गहरा हो गया है कि छूट नहीं रहा।

बस मालिक बनने का चक्कर — मालिक बनके उससे भी दूर हुए, बाप से दूर हुए, भाई से दूर हुए; मालिकपन का भाव बहुत खतरनाक है। जहां से भी हुआ, इस समय देखो — हुआ है ना? निकलना है। चाहे जितना भी गहरा हो, छोड़ना तो चालू करो। कैसे भी अपने आप को निकालो, समझदारी से। तो मालिकपन के भाव को छोड़ो, सेवकपन का भाव अपनाओ — सीधी सी बात है। और वो तब आएगा जब ईमानदारी-सत्कर्म होगा। सेवक ही उससे मिलता है, और सेवक बनने के लिए ईमानदारी और सत्कर्म — बस इतना ही है।

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वीडियो: जीव , माया और ब्रह्म क्या है ? #livesatsangyogijika #aadhyatmik_satsang #yogijikasatsang · 2025-03-09