आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P23-0112 · भाग 23

गुरु जी, आपका कहना है कि जरूरत में जियो। लेकिन किसी परिवार में एक व्यक्ति यह बात समझ जाता है और बाकी सदस्य नहीं समझते, उनकी जरूरत ज्यादा है — मेरी क्षमता भी ज्यादा है, पर मैं जरूरत में रहना चाहता हूं, और परिवार उससे ज्यादा में रहना चाहता है, डिमांड करता है; मैं प्रमुख हूं तो उनकी जरूरत पूरी करना मेरा कर्तव्य बनता है — इसमें संघर्ष बना रहता है। तो उनके साथ कैसे बनाकर चलें?

कोई बात नहीं — आप समझते हैं, आप जरूरत में जिएं। फैमिली की उनकी अपेक्षा बनी रहे, तो जितनी उनकी जरूरत है, उतना कर दो, जिस लायक आप हो। फैमिली का मतलब क्या है? एक-दूसरे की भावनाओं को समझना — या एक-दूसरे को गिराने के लिए मजबूर करना? उनके हिसाब से नहीं, आपके हिसाब से भी नहीं — उचित हिसाब से। जो तुमसे बेईमानी करवाए, ऐसे लोगों को छोड़ दो। जरूरत से ज्यादा जियोगे तो बेईमानी करनी पड़ेगी ना। वे डिमांड करते हैं तो मत करो ना — बोलो भैया, तुम कर लो; या तो करके दो। फिर परिवार ही कैसा जो हमें ना समझे, हमें कुछ करने के लिए मजबूर करे, विवश करे? त्याग ही परम सुख है — ऐसे लोगों का त्याग कर दो जो आपको ना समझें; और समझते हैं फिर भी नहीं कर रहे, तब तो और गलत हो गए। जितना आप कर सकते हो, उतना करो; अगर परिवार ज्यादा अपेक्षा रखता है तो उनसे कह दो — हमारी जितनी सामर्थ्य थी, हमने आपके लिए कर दिया; अब हम आपके लिए बेईमानी नहीं करेंगे, आपके लिए अपने आप को गिराएंगे नहीं। उनकी पूर्ति के लिए अपने आप को गिराओ मत। और एक बाप तो यही उम्मीद करेगा कि मेरे बच्चे सेट हो जाएं — तो उन्हें सत्संग सुनाओ, कभी यहां लाओ, धीरे-धीरे उनको समझ में आएगा।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: जीव , माया और ब्रह्म क्या है ? #livesatsangyogijika #aadhyatmik_satsang #yogijikasatsang · 2025-03-09