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प्रश्नोत्तर P23-0155 · भाग 23

गुरु जी, क्या आप अपनी पारिवारिक-सामाजिक पहचानों और बंधनों से मुक्त हो?

इसमें कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि अगर मैं कहूं मुक्त हूं, तो कैसे सिद्ध होगा? मैं कहूं नहीं हूं, तो कैसे सिद्ध होगा? क्योंकि मुक्ति और बंधन तो मानसिक है ना। सिद्ध कैसे किया जाएगा? उसके कर्मों से होता है। तो अगर मेरे कर्म देख के आपको लगता है कि मैं मुक्त हूं, तो मैं मुक्त हूं; और लगता है मैं बंधन में हूं, तो फिर मैं आपके लिए बंधन में हूं। लेकिन मैं अपने लिए क्या हूं, वो मायने रखता है। क्योंकि आपके लिए चाहे मैं मुक्त हूं, चाहे बंधन में — इसका कोई मतलब नहीं।

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