प्रश्नोत्तर P24-0113 · भाग 24
गुरु जी, यह जीव क्यों फंसा है? पहले से पूर्ण था, तो अब पूर्णता क्यों चाहता है?
अब पूर्णता इसलिए चाहता है कि अपूर्णता में उसे दुख है, बेचैनी है, उदासी है, तकलीफ है। इसलिए वह पूर्ण में होना चाहता है — जहां ना दुख हो, ना सुख हो, जहां आनंद हो। क्योंकि जीव सुख के चक्कर में तो गया, लेकिन जहां-जहां से उसे सुख मिला, वहां-वहां से दुख मिलने लगा। तो वो बड़ा परेशान हो गया कि मैं कुछ भी कर रहा हूं, उसका परिणाम दुख ही दुख आता है — चाहे वो रिश्ते हों, चाहे नाते हों, धन हो, वैभव हो, प्रॉपर्टी हो; शरीर एक तरफ धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। तो सुख जुटाता गया, और उसके सुख का परिणाम आया दुख। जब परिणाम दुख ही आता रहा, तो वो सोचने लगा कि बस अब एक काम करो, इससे छुटकारा पाओ। क्योंकि सुख से छुटकारा पाओगे, तभी दुख से छुटकारा पाओगे; जब तक सुख लेते रहोगे, वही सुख दुख का कारण बनेगा। तो यह बात जिनके भी समझ में आ जाती है — बहुत लोग समझ नहीं पाते, तो सुख ही इकट्ठा कर रहे हैं; और जो समझ पाते हैं, वो धीरे-धीरे अपने आप को इससे निकालने का प्रयास करने लगते हैं — उन्हीं को जिज्ञासु, उन्हीं को साधक, उन्हीं को सत्य का खोजी कहा जाता है।
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