प्रश्नोत्तर P24-0176 · भाग 24
गुरु जी, 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं' — इसका वास्तविक अर्थ क्या है? किताब से पढ़ के तो समझ आ गया, प्रैक्टिकल रूप में कैसे समझ में आएगा?
जब तक मेरा अस्तित्व है, तब तक वो नहीं — क्योंकि जब तक अस्तित्व है तब तक मैं दायरे में हूं, और वो दायरे में आ नहीं सकता। मैं कहां हूं? मेरे में। मैं किसके सहारे खड़ा है? मेरा से। मेरा मिटा तो बात खत्म; तो वही है, और कौन है। मिटाना किसी को नहीं है, उठाना किसी को नहीं — बस छोड़ना है। मानसिक पकड़े हुए हैं तो मानसिक ही छोड़ना है; और मानसिक इसलिए पकड़े हैं कि उससे कुछ मिलेगा, ये उम्मीद है। उम्मीद छोड़ दो, मानसिक छूट जाएगा। सीधा मानसिक छोड़ोगे तो नहीं छूटेगा; जब तक उम्मीद है, आशा बनी है कि मिल जाएगा, तब तक मानसिक बंधन है।
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वीडियो: साधना में आसन की शुद्धता का क्या महत्व है ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्म · 2026-09-08