प्रश्नोत्तर P29-0069 · भाग 29
गुरु जी, क्या "तू ही तू" का भाव मुक्ति की ओर ले जाता है?
अभी तो हम "तू" में फंसे हैं, तो "तू ही तू" कैसे मुक्ति ले जाएगा? अभी तो हम "मेरा" में हैं; अभी तो मैं खुद नहीं हूं, तो तू कहां? जब मैं खुद नहीं हूं तो तू कैसे? यह तो रटी-रटाई बात है — सब कहते हैं जो कर रहा है परमात्मा कर रहा है; फिर दोषी किसी को क्यों देते हो? जो कर रहे हैं हम कर रहे हैं, तभी तो फंसे। अगर परमात्मा करता तो कोई बंधन में आता ही नहीं। हमें कर्ता का अधिकार दिया गया, इसीलिए परिणाम हमें भोगना पड़ता है। फिर क्या जरूरत होती ज्ञान मार्ग, योग मार्ग, ध्यान मार्ग से चलने की? पहले "तू" और "मेरा" का खेल खत्म करो। "तू" बोलने के लिए सामने तो चाहिए — बिना देखे किसी से कहोगे "तू एक गिलास पानी ला" तो लोग हंसेंगे। तो पहले ना तू, और फिर ना मैं — फिर "वो"। यह यात्रा करनी है।
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वीडियो: गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु का क्या कर्तव्य है शिष्य के प्रति / #योगीजी_का_सत्संग #गुरु #पूर्णिमा · 2024-07-21