प्रश्नोत्तर P29-0086 · भाग 29
गुरु जी, ऐसा आशीर्वाद दे दो कि हमारी भी नैया पार हो जाए।
तुम्हें हम सत्संग दे सकते हैं, व्यवस्था दे सकते हैं, एकांत दे सकते हैं — और क्या दें? पूरी जिंदगी यहां रहो, तुम्हें कोई फिक्र नहीं, आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ सोचना ही नहीं। मेरी तरफ से जितना देना था मैंने दे दिया; अब आपके ऊपर है कि आप साधना में लगे हो कि प्रपंच में, किनारे बैठ के आत्मिक चिंतन कर रहे हो कि चिंता कर रहे हो। मैं ना पावती फाड़ता हूं ना चंदा काटता हूं; सारा काम अपने सामर्थ्य से, मूल्य देके करता हूं — अपना जीवन प्रत्यक्ष है। यहां कोई मालिक भी नहीं, सुबह माथा टेकने का कोई नियम नहीं, पूरी स्वतंत्रता है। व्यवस्था मिल गई — अब आप इसका कैसे उपयोग करते हो, आपके ऊपर है।
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