आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P29-0089 · भाग 29

गुरु जी, आप इतनी व्यवस्थाएं लेकर चल रहे हो, लेकिन हम घर की एक छोटी सी व्यवस्था चलाने में ही परेशान हो जाते हैं — टेंशन, चिंता — तो कैसे चलें?

इच्छा में कर रहे हो ना। जिससे तुम्हारी इच्छा ज्यादा पूरी हो रही, उसके लिए ज्यादा करते हो — पहले मां के लिए सब कुछ करने को तैयार थे, अब पत्नी के लिए, बच्चे के लिए; भाई के बच्चे के लिए उतना नहीं, बहन के बच्चे के लिए और कम। तुम दायरे में जीते हो। यहां कोई भी आए, सबसे एक जैसा बर्ताव होता है — कोई ऊंचा-नीचा, वीआईपी नहीं। वैसे ही घर में समभाव, समदृष्टि रखो। जरूरत में जिसको करना है कर दो, जरूरत नहीं है तो अपना काम करो; परिवार में देखो किसकी क्या जरूरत है और मेरी सामर्थ्य क्या है — सामर्थ्य से ज्यादा करोगे तो भी परेशान रहोगे। जरूरत में जीना सीखो, जरूरत में करना सीखो, अपनी सामर्थ्य के अनुसार।

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