प्रश्नोत्तर P3-0006 · भाग 3
पार्टनर या परिवार वाले अध्यात्म में रुचि नहीं रखते; लालच-कहानी-जबरदस्ती से पढ़ाने का प्रयास करते हैं। सीमा दीदी जैसी भाव से सेवा करती हैं पर अध्यात्म से मतलब नहीं। क्या हमें उन्हें खींचना चाहिए या अपनी ऊर्जा बचाकर अपनी यात्रा पर फोकस करें?
मेरे समझ से अपनी यात्रा करनी चाहिए। एक-दो बार बोल दिया — बहुत है। जिससे वर्षों आध्यात्म चर्चा की, क्या उसने कभी सामने से कहा ‘कुछ बताओ’? जिसको कहानी सुननी हो आधी सुना दो तो पूछेगा बाकी कब — इंटरेस्ट रहता है। आपने वर्षों चर्चा की और उसने कभी खुद न पूछा — मतलब जिज्ञासा नहीं थी। बच्चों को बचपन से शिक्षा दो, अबोध हैं; लेकिन विवाह के बाद एक-दो बार बोलो, इच्छा नहीं तो छोड़ दो। ठोकर मारेगा समय तो खुद खोज लेगा। पीछे समय बर्बाद नहीं करना।
साल में एक बार सत्संग हो — मैं बहुत बोल चुका; अब भाव ये कि जिज्ञासु सामने हो तब सत्संग। पहले पकड़-पकड़ वीडियो बनाता था ताकि ज्ञान निकले; अब वीडियो वाली इच्छा गई, प्रबल जिज्ञासु चाहिए। ज्ञान कुएं जैसा — जितना निकालो उतना आता है; पूछोगे तभी निकलेगा। प्रत्यक्ष ज्ञान लोगों के लिए खोजा; लोग न रहें तो निकलता ही नहीं।
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वीडियो: अपूर्ण से पूर्णता की तरफ कैसे जाएं #योगी · 2026-01-10