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प्रश्नोत्तर P3-0089 · भाग 3

एक साधिका: मैंने चार दिन तक दृश्य देखा कि विष्णु जी बाहर निकल रहे हैं और उनका सुदर्शन चक्र बहुत तीव्र गति से चल रहा है; मैंने कहा मुझे अपने अंदर कर लो, तो उनका दायरा बढ़ गया और चक्र से मेरी गर्दन कटकर अलग हो गई, मुझे डर लगा। फिर ऊपर बहुत ऊंचाई पर ओम दिखा और तीव्र किरणें निकलीं। इसका अर्थ क्या है? मैंने सोचा कि क्या अंतर्मन में कोई सूक्ष्म विकार — शायद पूर्व जन्म का — था जिसे उन्होंने सुदर्शन चक्र से काट दिया? क्या यह चिंतन सही है?

और आगे बढ़िए, और आगे भी बस देखते जाइए। आप इस पर विचार करिए कि जब गर्दन अलग हुआ तब क्या हुआ — उस स्थिति पर चिंतन करना, और फिर आगे देखना, बस आगे बढ़ते जाओ। कोई भी दृश्य का यह भाव नहीं बनाना कि मुझे फिर दिख जाए; बस देखते रहना है। फिर कटे, ऐसा भाव नहीं लाना है। मैंने कहा ना, हर वक्त आप या तो उठ रहे हो या गिर रहे हो; या तो विकार भर रहा है या विकार खत्म हो रहा है। जितने भी जन्म हमने लिए हैं, सबका तो पड़ा है। जब तक विकार है तभी तक स्थिति नहीं है; विकार हटते ही अवधूत की स्थिति आएगी, उसके बाद ज्ञान हो जाएगा। अगर हम उस परम आनंद में नहीं हैं तो इसका मतलब कहीं न कहीं विकार है — अगर पानी पूरी तरह निर्मल, साफ नहीं दिख रहा तो इसका मतलब कोई न कोई कचरा है। इस जन्म का ध्यान नहीं, तो कोई बात नहीं; लेकिन कहीं न कहीं बहुत कुछ हुआ है। उस समय आपकी स्थिति क्या थी, कैसा भाव बना — इस पर चिंतन करोगे तो उसमें जाओगे। आप डर गईं — तो डर क्यों? डर के पीछे का कारण क्या? जब मिटना ही है तो डर क्यों?

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 14 जून 2026 #योगी · 2026-06-14