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प्रश्नोत्तर P3-0096 · भाग 3

एक माता जी: मैं दिल्ली-गुड़गांव में अपने यहां भी आपका सत्संग कराना चाहती हूं — उसके लिए क्या व्यवस्था और कितना खर्च लगता है (साउंड, टेंट आदि)? और आप सत्संग के छह लाख क्यों लेते हैं?

आप जैसा रखना चाहो रखो — कम्युनिटी सेंटर में, कहीं भी रख सकते हो। जितने लोग YouTube पर मुझे सुनते हैं, वे आते हैं। जहां भी रखा जाता है, व्यवस्थापक अपनी व्यवस्था करता है, तीन दिन का रखा जाता है; पता चैनल की पोस्ट में आ जाएगा, आप डायरेक्ट आ जाना, वहां भी अपने प्रश्न कर सकते हो। हम सत्संग तो निशुल्क करते हैं — यहां देखो रहना-खाना सब फ्री, आजीवन रहो। छह लाख सत्संग का थोड़े ही है, वह खर्चे का है — गाड़ी, आश्रम, अपना आगे का खर्च सब चलाना पड़ता है। पहले हम फ्री में ही जाते थे, तो लोगों ने क्या किया — हमारे घर आओ, हमारे घर आओ — हम परेशान हो जाते थे। जैसे दवा भी पहले फ्री में बांटता था, तो लोग भैंस के लिए, चाची के लिए, माई के लिए मांगने लगे, फिर पैसा लगाया। तो पहले दो लाख रखा और आने-जाने का किराया; फिर छह रख दिया — जितना मेरा आने-जाने का खर्च होता है उतना दो। मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन जब मुझे काम करना है तो उसके लिए तो चाहिए ही चाहिए, तो उसके लिए जरूर लूंगा। बताना जरूरी है और कराना भी चाहिए। पैसा है, लेकिन निकलना भी तो चाहिए — बीमारी हो जाए तो आदमी खेत बेचकर बीसों लाख निकालता है, सब कुछ निकालने को तैयार होता है। बात यह है कि मैं कितना निकाल सकता हूं, कितना दे सकता हूं; कंजूसी है तो नहीं निकालेगा। अगर आपकी क्षमता है तो सत्संग कराना चाहिए, ज्ञान का प्रचार करना चाहिए। आज बुद्ध का ज्ञान फैला है तो धन से ही फैला है — जिस व्यक्ति ने उन्हें चौमासे के लिए जमीन दी, उसने वह जमीन स्वर्ण मुद्राओं से बिछा दी। चाहे बुद्ध का हो, चाहे कबीर का, जिसका भी ज्ञान हम तक किताबों आदि द्वारा आ रहा है, उसमें पैसा ही खर्च हुआ है।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 14 जून 2026 #योगी · 2026-06-14