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प्रश्नोत्तर P3-0139 · भाग 3

गुरु जी, इसमें नियम बीच में आ रहे हैं — जो नियम हम पर थोपे गए, बांध दिए गए थे, उनका क्या करें? और पाप-पुण्य से कैसे निकलें?

अरे भाई, नियम बोलना तुम्हारी स्वतंत्रता है, नहीं लेना मेरी — नहीं लूंगा, क्या करोगे? मैं नियम के परे हूं। नियम किसके लिए है — मेरे लिए ना? मैं वही नहीं हूं। जब मैं हूं ही नहीं तो नियम कैसे पालन करूं? पाप-पुण्य लगेगा — जब मैं हूं ही नहीं तो किसको पाप-पुण्य लगेगा? वह तो नियम लेने वाले को लगेगा। पाप-पुण्य कब चालू हुआ, उससे मुझे मतलब नहीं; मैं इसमें हूं, इससे मतलब है — इससे निकल जाऊं। जानकर क्या करोगे? पीछे जाओ ही मत — पीछे तुम जीकर आ रहे हो; क्या दोबारा जीना है? समय बर्बाद मत करो, निकल लो। पाप-पुण्य से निकलें कैसे? 'कुछ न करने' में आ जाओ, बस खत्म। करने वाले को पाप-पुण्य लगता है। जरूरतमंद की सेवा करो, ईमानदारी-सत्कर्म करो, निकल लो — न पाप, न पुण्य; न इच्छा, न अपेक्षा, न राग, न द्वेष, न मोह, न आसक्ति। अब तुम्हारे अंदर जो था, उससे कैसे छूटेंगे? इस मार्ग में जा रहे हो, पता चलेगा तुम्हारे अंदर क्या-क्या है, किसमें फंसते हो — लोग आश्वासन देंगे तब पता चल जाएगा। छूटेंगे कैसे? छोड़ने से — जैसे पकड़ा, वैसे छोड़ो। पकड़ रखा है और पूछते हो छूटूं कैसे? मैं कहूंगा बेटा, याद करो पकड़ा कैसे था — जैसे पकड़ा, वैसे छूटेगा।

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वीडियो: मां नर्मदा के किनारे सत्संग _ सतगुरु क्या होता है ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2025-02-01