प्रश्नोत्तर P3-0184 · भाग 3
(कुटिया में साधक) आप आत्मज्ञान, आत्मचिंतन, आत्मबोध, आत्मा और जीव की बात करते हैं — ये ज्यादा समझ में नहीं आते। आत्मा हम तो हैं, यह समझ में आता है, लेकिन ये आत्मा कहां पर है? इन्हें थोड़ा क्लियर कर दीजिए। क्या मैं ही सब कुछ हूं? और क्या हमें फिर से बच्चे जैसा (सारी जानकारी से खाली) हो जाना है?
अब जैसे मान लीजिए मोबाइल का सिम कार्ड है। अब नंबर कहां है? अगर पूछा जाए इस पूरे सिम कार्ड में नंबर कहां है, तो क्या कोई जगह फिक्स है? लेकिन है उस सिम कार्ड में ही — पक्का है कि नहीं? लेकिन क्या कोई विशेष जगह बता सकते हो? पूरे सिम कार्ड में बोल सकते हो। तो मेरा कहने का मतलब है कि आप अपने आप को कोई भी नाम दे दो — चाहे आप उसे आत्मा कहो, चाहे मैं कहो, चाहे आत्मबोध कहो — आप कोई भी नाम दे दो।
मैं ही सब कुछ हूं — नहीं; मैं ही सब कुछ हूं, तो भ्रम हो जाएगा आपको। मैं हूं, बस। क्योंकि मैं ही सब कुछ हूं, तो फिर ये सब कुछ तो यह है — तो कहोगे यार, मैं सब कुछ हूं; और जब आपके विरोध में कोई खड़ा होगा, तो फिर आप उसके साथ अलग बर्ताव करोगे। तो मैं हूं — इतना तो ठीक है, लेकिन मैं सब कुछ हूं, ये मान लेना मतलब आप भ्रमित हो गए। तो मैं हूं — बस इतना बहुत है। अगर मैं (अपने आप में स्थिर) हो जाता, तो कोई बात ही नहीं होती ना भाई। तो मैं हूं — अब देखना है कि मैं कहां हूं।
मैं हूं, ये ठीक; मैं कहां हूं — तो क्या मैं जहां हूं, क्या मैं वहां रहना चाहता हूं? क्योंकि मैं कहीं हूं ना। तो क्या मैं वहां रहना चाहता हूं — हां या ना? अगर हां, तो ठीक है, फिर रहो, कोई बात नहीं। और अगर नहीं, तो फिर वहां से मैं कैसे निकलूं, उसके लिए काम करो। क्योंकि आप कहीं स्थिर हो गए हो — क्या आप परिवर्तनशील में स्थिर होना चाहते हो? उसे रोकना चाह रहे हो, लेकिन वो रुक नहीं रहा है। तो मेरा यह कहना है कि बहुत समझदारी से यात्रा करो। शब्द मकड़ी के जाल की तरह हैं; कोई भी शब्द सोच-समझ कर, सूझबूझ के बोलिए, बस इतना ही।
दिमाग में भी — आप जरा समझो — हमने पांच इंद्रियों द्वारा जितना घुसाया है, वही है। विचार में अगर देखा जाए, तो पांच इंद्रियों से जितना घुसा है, उसको छोड़ दो, तो उसके अलावा क्या है? अगर एक बार आपकी जानकारी को हटा दिया जाए, तो फिर आपके पास क्या है?
मैं एक ही बात कहता हूं कि तुम जहां हो, वहां से बात करो। छोड़ो बचपना को। आप बच्चों का उदाहरण देके अपनी तुलना उससे क्यों कर रहे हो? वहां नहीं हो ना। क्या कभी बच्चे थे तो तुम्हें ज्ञान था? नहीं था। आप (वह) बात ही मत करो। अगर सच में आपको निकलना हो, तो जहां हो वहां की बात करो। तुलना तो आप किसी से मत करो; तुलना हमें गिरा देती है। अब कहा जाता है कि हमें बच्चे जैसा हो जाना है — तो क्या जितने बच्चे हैं, सब (ज्ञानी) हैं? आप भी तो कभी (बच्चे) थे; वो तो अबोधता है, कुछ पता ही नहीं है। तो क्या उस स्थिति में जाना चाहते हो? उस स्थिति से तो आए ही हो। अगर वो स्थिति आनंद की होती, तो थोड़ी छोड़ते आप। वो तो कुछ पता ही नहीं था, अबोधता थी। तो आप जहां हो, वहां से बात करो। मैं तो एक ही बात कहना चाहता हूं आप लोगों से — तुलना करना छोड़ो। तुलना हमें गिरा देती है, और तुलना हमें कहीं नहीं ले जाती, सिर्फ परेशान करती है।
तो मैं हूं, और मैं कहां हूं — बस यही बात है, इतनी सी बात है। तो क्या मैं जहां हूं, ठीक हूं? तब तो ठीक है, कोई बात नहीं। अगर मैं वहां ठीक नहीं हूं, अब ये देखना है कि मैं यहां से कैसे निकलूं। अगर मैं अपने आप को वहां से नहीं निकाल पा रहा हूं, तो मैं किसी का सहयोग ढूंढूं। जैसे मैं रास्ते में बोझा उठा रहा था, नहीं उठ रहा था, तो मैंने कहा — ये भाई, जरा मदद कर दो; या उसने आपको उठाते देखा, आप नहीं उठा पा रहे हो, तो वो आपकी हेल्प कर देता है, और आप आराम से बोझा ले अपने घर तक पहुंच जाते हो। वही बोझा आपसे उठ नहीं रहा था, लेकिन वही बोझा सर पर आने के बाद आप आराम से ले चले जाते हो।
तो ऐसे ही — मैं हूं, मैं कहां हूं। अगर मैं जहां हूं ठीक हूं, तब तो कोई बात ही नहीं है। अगर मैं ठीक नहीं हूं, तो मैं वहां से अपने आप को कैसे निकालूं। (और) होना कहां चाहता हूं, ये भी तो डिसाइड करना पड़ेगा ना। जहां हूं वहां ठीक नहीं हूं, तो अब होना कहां चाहता हूं — मैं कहां ठीक रहूंगा — यह भी जानना बड़ा जरूरी है, नहीं तो निकालने का भाव ही नहीं होगा। एक रस्सी के सहारे मैं खड़ा हूं, तो दूसरी रस्सी नहीं दिखेगी तो हम पकड़ भी नहीं सकते। इस पॉइंट को बहुत गहराई से समझना, इसलिए मैं रिपीट कर रहा हूं — मैं हूं, और मैं कहां हूं। और देखूंगा तो मैं हूं, और मैं यहां परेशान हूं; तो मैं कहां हो जाऊंगा तो मैं एकदम आनंद से भर जाऊंगा — तो मैं अब अपने आप को यहां से निकाल लूं, बस बात खत्म। अगर मैं नहीं निकाल पा रहा हूं, तो मैं किसी की सहायता लूं। मुझे सहायता लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि मैं यहां था, और यहां होने में अनेकों लोगों का बल मिला है; मैं अकेले थोड़ी ना यहां पे आ पाया — यहां पर आने के लिए अनेक लोगों का बल है। अब एक व्यक्ति मुझे ऐसा चाहिए — कि जितने लोगों का हाथ मेरी जिंदगी में यहां तक लाने के लिए लगा है — उन सबसे (ज्यादा बल वाला), और उसी को गुरु कहा गया है। उसमें इतना बल रहता है कि अगर आप तैयार हो तो आपको निकालने में मदद कर देगा।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01