आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0031 · भाग 30

गुरु जी, गीता में कृष्ण ने पहले अर्जुन से कहा कि ना मैं कुछ करता हूं, ना कराता हूं, ना पुण्य में लिप्त होता हूं, ना पाप में — मैं सिर्फ दृष्टा बनकर देखता हूं; और बाद में विराट स्वरूप दिखाकर कहा कि जो करता हूं वो मैं करता हूं। मुझे यही समझ में आया कि जब तक अर्जुन का समर्पण नहीं हुआ था तब तक अर्जुन कर रहे थे, और समर्पण होते ही कृष्ण ने कहा मैं करता हूं — क्या यह सही है?

सही पकड़ा आपने, एकदम सही। जब तक आप कर रहे हो तो वो नहीं कर रहा है; आप करने से मुक्त हुए तो वो कर रहा है, फिर वो करता है सब। इसलिए ये संतों ने कहा — जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं — उसका भी यही मतलब है। लेकिन हम पकड़ते कहां हैं इन मतलबों को? जब खुद एकता हो जाओ तब पता लगेगा। हम एक को बस पकड़ते हैं — भूख। जीव-जंतु जितने पृथ्वी पर हैं सब भूख को पकड़ लेते हैं; एक छोटा सा अबोध बालक भी भूख को पकड़ लेता है, उसे पता है रोऊंगा तो मिलेगा। भूख लगी, मुझे भोजन चाहिए — वो भोजन जो शरीर को पोषण दे, बस वही; लेकिन भूख मेरे तरीके से मिटनी चाहिए, मिर्ची चार चाहिए वो भी तीखी, अचार नींबू का नहीं मिर्ची वाला चाहिए — ये स्वाभाविकता में नहीं आता। ये तुम पकड़ रहे हो, इसी में फंसे हो; कहीं ना कहीं हम भूख में, और वो भी अपने तरीके में, उलझे हुए हैं।

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वीडियो: अंतःकरण क्या है कहां स्थित है और क्या कार्य है ? #yogijikasatsang #live_satsang #Aadhyatmik · 2024-12-04