आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0033 · भाग 30

गुरु जी, कुछ समय मैंने ऐसा अनुभव किया कि अगर घर आना-जाना करते हैं तो फिर से वो आसक्ति हो जाती है। क्या घर छोड़कर साधना करने वाले को घर आना-जाना चाहिए?

नहीं आओगे-जाओगे तो कैसे पता चलेगा कि आसक्ति है या नहीं? मैं तो अपने घर अभी भी आता-जाता हूं। अगर हम आएंगे-जाएंगे ही नहीं तो हम तो डरे हुए हैं, फिर पता कैसे चलेगा? आने-जाने से ही पता चलेगा आपको कि आप में अभी कितनी आसक्ति, कितना अटैचमेंट, लगाव है। आना-जाना चाहिए। जिन्होंने मुझे गोद में खिलाया, जिन्होंने पालन-पोषण किया, सहायता की — अगर मुझे कुछ मिला है और मैं समाज को बांट रहा हूं, तो उनको नहीं दूं? वो भी तो समाज के हिस्से में आते हैं। तो उनको भी देकर आता हूं।

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