आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0136 · भाग 30

आप ही बता दो, गलती मैंने कहां की? मैं कैसे बताऊं — क्या मैं यहां से सुधर जाऊं?

आप देखिए कि आपने कभी किसी भी आदमी या औरत को, ईमानदार रहते, बेईमान सिद्ध किया हो, या बेईमान को ईमानदार सिद्ध करके छोड़ दिया हो — यह आपको देखना है, क्योंकि आप ही ने किया है। हुआ है, तो बस भोग लो और ईमानदारी-सत्कर्म करके निकल जाओ — यह सीधी बात बोल रहा हूं। बात नौकरी की नहीं है, बात एक ताकत की है। जब व्यक्ति अपनी ताकत का दुरुपयोग करता है, सही को गलत, गलत को सही सिद्ध करता है, तो जब उसकी बद्दुआ लगती है और उसका समय आता है, तो वह ऐसा भोगता है कि 56 प्रकार का भोजन भी उसे विष लगता है। इसलिए ईमानदारी-सत्कर्म करते हुए अपने आप को निकाल लो; ज्यादा बुद्धि लगाने की जरूरत नहीं है। यहां कोई दूध का धुला नहीं है — चाहे आप, चाहे मैं, चाहे कोई भी। एक काम करो, ईमानदारी-सत्कर्म से धो लो; हुआ सो हुआ। हम किसी की मजबूरी का फायदा उठा लेते हैं, उसकी भावनाओं के साथ खेलते हैं, बाद में उसकी बद्दुआ हमें खा जाती है — फिर ना करोड़ों रुपया बचाएगा, ना अरबों। राम के पिता को एक साधारण पिता ने श्राप दिया — ना राम बचा पाए, ना दशरथ अपने आप को बचा पाए; पुत्र-वियोग में तड़प-तड़प के प्राण छूटे। जो हुआ सो हुआ, अब आगे मत करिएगा — बस ईमानदारी और सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा करो और आगे बढ़ो।

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