आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0138 · भाग 30

गुरुदेव प्रणाम। जीव किसी भी चीज में एक समान स्थिर क्यों नहीं हो पा रहा है? हर पल भाव तो वही है, पर उस पर लगने वाला बल और तड़प कभी ज्यादा, कभी कम क्यों हो जाती है?

इसलिए कि जिस शरीर के द्वारा भाव लगा रहे हो, शरीर ताकतवर होता है, कमजोर होता है; और जहां पे आप भाव लगा रहे हो, वो परिवर्तनशील है — चाहे वो व्यक्ति विशेष हो, चाहे वस्तु हो, हर क्षण बदल रही है। देखो, कोई चीज लाओ, उसके प्रति क्या भाव रहता है — जैसे एक-एक दिन बीतता है, धीरे-धीरे भाव कम होने लगता है। फिर उससे अच्छी आती है तो उसके प्रति भाव हो जाता है। जिसे आप लाए थे, इतना उसके प्रति भाव था कि कहीं उस पर खरोंच ना आए, और वही बहुत आसानी से छूट जाता है। तो बाहर की चीजें बदलती रहती हैं — चाहे व्यक्ति विशेष का व्यवहार हो, चाहे वस्तु हो, हर क्षण परिवर्तनशील है। तो जब वो बदलता है, तो हमारा भी भाव बदलेगा, क्योंकि जिस शरीर के द्वारा मैं भाव बना रहा हूं, वो शरीर भी बदल रहा है और जिसके लिए बना रहा हूं, वो भी बदल रहा है — तो मेरा भाव भी बदलेगा, स्वाभाविक है। तो मुझे समझ के निकलना है, अपने आप को निकालना है।

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