आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0143 · भाग 30

शिव जी प्रणाम। कल के सत्संग में आप बहुत भाव-विभोर हो गए थे; उस वक्त आपके मुखारविंद से एक वाक्य निकल आया कि मैं पहले उसको, मतलब परमात्मा को, खूब तृप्ति-संतृप्ति होने तक देखूंगा, बाद में मिलूंगा। मुझे संशय उठ गया — आत्मज्ञान होते वक्त वो किसको देखते हैं? उस वक्त क्या होता है? बाद में किसको देखने के लिए तरसते हैं? ये अंतर क्या है?

देखो, ये भाव लाइव में ही उठा था, लेकिन बहुत लोग समझ नहीं पाते, इसलिए बोला नहीं। जब हम यात्रा करते हैं, हम विकारों में लिप्त हैं — राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता। तभी मैं वहां से छूटने के लिए यात्रा कर रहा हूं। मैं अनेक जगह बंटा हूं; भिन्न-भिन्न रूपों में अपने आप को इतना बांट लिया हूं कि मेरे स्व का मुझे बोध नहीं है — मैं ही कैसा हूं, यह भी मैं भूल गया हूं। तो जब शुरुआत से यात्रा होती है, तब मैं अपने आप को निर्विकार कराने का प्रयास करता हूं; जितनी गंदगी लोगों के द्वारा धारण की है, उसकी सफाई में लग जाता हूं, क्योंकि मैं अपने आप को तभी देख पाऊंगा जब मैं साफ करूंगा। जैसे कपड़े पे इतना गंदा लग गया है कि कपड़े का ओरिजिनल रूप दिख नहीं पा रहा; उसके मूल रूप को देखने के लिए पहले पूरी गंदगी हटानी पड़ेगी — उस गंदगी के पीछे वो रूप अभी भी वैसा ही है। हम माया में हैं तो हम बीच में हैं — माया में भी पूरी तरह लिप्त नहीं हो पाए, क्योंकि उसका आदि-अंत नहीं है, और पूर्ण से छूट कर अपूर्ण हो गए हैं। मैं अपवित्र हो गया हूं, तो अपने आप को शुद्ध कर रहा हूं, पवित्र कर रहा हूं। जब मैं पूरी तरह शुद्ध, निर्विकार हो जाता हूं, अपने स्व में स्थिर हो जाता हूं, तो मुझे अपने होने का बोध होता है — कि सारे दुखों का, सारे सुखों का कारण सिर्फ मैं ही था। अब ना मेरे पास सुख है ना दुख है, अब सिर्फ मैं हूं — अज्ञान हट गया। और जब वो अपने आप में स्थिर हो जाता है, तो उससे मिलने की भी व्याकुलता नहीं रहती — कोई तड़प नहीं, उदासी नहीं, बेचैनी नहीं, निराशा नहीं — क्योंकि अब पक्का हो गया कि वह मिलेगा। मैं अपने केंद्र तक आ गया, पवित्र हो गया; अब मैं उसका इंतजार कर रहा हूं — अब उसकी बारी है, मेरी बारी खत्म। मैं कर्ता भाव से ही मुक्त हो गया; व्याकुलता तो कर्ता भाव में उठेगी। जैसे कोई अपराध करके लिस्ट में आ गया, तो कानून उसे खोज रहा है — वैसे ही जब आप अपने स्व में स्थिर हो गए, तो वो आके खुद मिलेगा; आप उनकी लिस्ट में आ गए, पात्रता हो गई। और उसने अपने संकल्प से अपने को रोक रखा है — उसने यात्रा में दुख देखा, संकल्प लिया कि ऐसे मार्ग की खोज करूंगा जिससे अनेक लोग तर जाएं। मैं देख के बोल रहा हूं — उसने खुद रोक के रखा है, क्योंकि मिलन तब होगा जब तुम और कहीं नहीं रहोगे। जैसे ही वो संकल्प पूरा होगा, उससे उसका मिलना हो जाएगा। ये शब्दों में इसलिए बोला जा रहा है कि आप शब्दों द्वारा ही समझोगे।

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वीडियो: कल आपने बोला मैं पूछ नहीं पाई... #योगी · 2026-05-31