आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0197 · भाग 30

गुरु जी, भ्रमण के बारे में बताइए — भ्रमण का मतलब क्या है?

भ्रमण का मतलब घूमना-फिरना नहीं होता। एक मेरा घर है, मेरा संसार; वहां से मैं निकला इस जगत में। किस लिए निकला? घूमने नहीं, खोजने निकला। कुछ खोज थी जो मुझे उस घर में नहीं मिल पा रही थी, तो मुझे लगा इस जगत में मिलेगा। आपके संसार का आदि-अंत है, इस संसार का आदि-अंत नहीं — ये भवसागर है। भ्रमण का मतलब होता है — मेरी खोज जहां लेके जाए। दसों दिशाओं को छोड़ दिया; मुझे पता नहीं कि कहां जाना है, बस खोज में जाना है। जहां आपकी खोज पूरी हो रही है, वहां तब तक रुको; जैसे ही लगे कि यहां मेरी खोज नहीं है, वहां से निकल जाओ — न उस व्यक्ति के लिए रुको, न उस जगह के लिए। हो सकता है मैं निकला और कुछ ही दूर जाके पूर्ण हो गया, तो आगे जाने की क्या जरूरत? मैं घूमने थोड़ी निकला हूं, स्वयं की खोज में निकला हूं। व्यवस्थाओं के लिए मत रुको — सारी व्यवस्थाएं, भोजन से लेके सब कुछ, आपके घर पर मिल रही थीं; अगर व्यवस्थाओं के लिए रुक गए तो आप खोजी हो ही नहीं। आपके न होने से आपके परिवार को वियोग का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए समय का सदुपयोग करो। व्यवहारिक बातों में मत लगो, मनोरंजन में मत लगो — उसी से तो निकल के आए हो। आत्मिक चिंतन करो, आत्मिक मनन करो, पूरी तरह साधक बन जाओ। कब मृत्यु आ जाए किसी को पता नहीं। खोजी हमेशा ग्यारहवीं दिशा में यात्रा करता है; भोगी दस दिशाओं में — चार दिशा, चार कोण, एक ऊपर, एक नीचे। खोजी को कहा गया है — धरती बिछौना है, आसमान ओढ़ना है। और कह रहे हो मैं गद्दी से उतरूंगा नहीं, गर्मी-ठंडी की सब व्यवस्था कर ली — तो क्या तुम्हें अनुभव होगा? शुरुआत में कम लो, धीरे-धीरे कम करो, प्रकृति के साथ हो। सच में खोजी बन जाओ; या तो नहीं कर सकते तो घर पे रहो, सारी व्यवस्थाओं के साथ जियो।

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वीडियो: भ्रमण क्यों करना चाहिए?भ्रमण के फायदे (Why should you travel? Benefits of Travelling.) in Hindi · 2026-03-18