प्रश्नोत्तर P31-0048 · भाग 31
गुरु जी, अगर हम यहां आपकी कुटिया में रहें तो हम स्वतंत्र हैं, लेकिन हम सोचते हैं कि हमारे परिवार से कुछ और लोग आएं तो वो क्यों नहीं रह सकते — इसलिए यहां पास में अपनी जमीन लेना चाहते हैं।
वो भी रह सकते हैं। "मेरा" में रहने से अच्छा है अपनों में रहो। पुरानी वाली आदत — वो हम ठीक कर देंगे, उसकी चिंता आप क्यों कर रहे हो? यह बन रहा है, आप ही लोगों के लिए बन रहा है, आप आके आराम से रह सकते हैं। यहां का सिस्टम ही ऐसा है कि अगर रहा तो बदलना ही बदलना है। आप जैसे ही अलग रहे, आपको वो प्रेम थोड़ी मिलेगा — आप तो बंट गए, उस ऊर्जा से बंट गए, फिर आप दायरे में हो गए। अगर कोई जरूरत हो, प्रोग्राम हो तो बात अलग; रहना है तो फिर यह बन किस लिए रहा है? हम इसके पीछे इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं? मुझे थोड़ी उसमें रहना है — उसमें साधक लोग रहेंगे; यह लोगों के लिए ही बन रहा है, और उन लोगों में आप ही तो हो। यह बहुत भाव से, प्रेम से तैयार हो रहा है। आप कुछ लेकर बनाएंगे तो "मेरा" से तैयारी करेंगे, और जिस स्थिति में आप काम करोगे वही भाव उसमें जाएगा — और उसी "मेरा" से तो छूटना है। आप तैयार करोगे तो उसमें एक बंधन हो जाएगा, उस जगह से, उस घर से मोह हो जाएगा। एक जगह तो ऐसे उलझा के रखे हो, और जगह क्यों उलझ रहे हो? लोग ऐसे ही फंस जाते हैं।
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वीडियो: जीवन जीने की कला क्या है ? #योगीजी_का_सत्संग #aadhyatmik_satsang #live_satsang · 2024-12-03