प्रश्नोत्तर P31-0113 · भाग 31
गुरु जी, आप अपना वो वाकया बताएं जब आपने प्रेम को पहली बार देखा, समझा।
प्रेम तो मेरा जीवन है। मैं बचपन में प्रेम से ही जिया। ना मैंने कभी संचय किया, ना मैंने कभी किसी को पराया समझा। मैं जिसके साथ रहा, पूरी तरह रहा। मेरे पास जो कुछ था, चाहे मेरी समझ थी, चाहे धन था, चाहे शरीर था, मैं सब लेकर समर्पित था कि सामने वाला खुश रहे। कोई भी रिश्ता मैंने अपने जीवन में रखा, चाहे दोस्ती-यारी कुछ भी, तो उस रिश्ते में 100 में 101% दिया, मैं हमेशा सामने वाले के लिए मिट जाता हूं। मुझे प्रेम के लिए प्रयास नहीं करना पड़ा। बचपन से मेरा यही काम था — लोगों की केयर करना, लोगों का ध्यान रखना, लोगों के लिए कुछ करना, चाहे गांव हो, चाहे स्कूल हो। उसके लिए बहुत तकलीफें सहनी पड़ती थीं, लेकिन मैंने अपना प्रयास कभी नहीं छोड़ा। और मैं इसी को प्रेम समझता हूं कि आप जिसके साथ हो, पूरी तरह हो।
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