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प्रश्नोत्तर P4-0067 · भाग 4

(कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है।

अरे, उससे बहुत लोग लाभ लेंगे ना; आपको भी करवाना चाहिए। आप तो शिक्षक हो ना, इतनी पेमेंट है। पागल जैसी बात कर रहे हो — 1 लाख पगार है, और 6 लाख की ताकत नहीं है? कर्जा ज्यादा (मान) बनाने के चक्कर में ले लिया। अगर तुम अच्छे से जीते, तो कर्जा लेने की क्या जरूरत थी, बताओ — लाख रुपए पाने के बाद कर्जा? मतलब तुम बहुत ज्यादा मान के चक्कर में पड़ गए — विशाल बंगला चाहिए, यह चाहिए, हॉल चाहिए, वह चाहिए। तुम्हें तो एकदम बढ़िया से सत्कर्म करते हुए जीना चाहिए, शिक्षक की तरह जीना चाहिए; तुम तो शिक्षक से सेठ बन गए। आप शिक्षक हो, तो शिक्षक का जीवन कैसा होता है? जरूरत में जीना। आपका जीवन कितना खूबसूरत होता! आज आप कितने परेशान हो, क्योंकि आप सेठ की तरह जीने लगे। आपको तो एक शिक्षक की तरह रहना चाहिए; बच्चों को ये शिक्षा मिलती कि यह व्यक्ति जरूरत में जी रहा है। आपको इतना खड़ा करने की क्या जरूरत है, बताओ? वो (गोयल जी) 400 पेंशन पाते हैं; उन्होंने 6 लाख देकर सत्संग करवाया, और व्यवस्था अलग से की; और तुम 1 लाख के ऊपर पाकर कह रहे हो कि मैं उस लायक नहीं हूं। और इसके बाद मेरे कार्य में भी, इस व्यवस्था में, उन्होंने 10 लाख के ऊपर सहयोग दिया, वो तो अलग; उसके बाद सत्संग भी कराए, 6 लाख; उसके बाद आने-जाने का खर्च। और रहते कैसे हैं — आप लोगों की तरह; ऐसा थोड़ी ना कि (अलग ढंग से) रहते हैं — यहां वैसे ही रहते हैं गोयल जी। भगवान का (भाग) मत निकालो, जरूरत का निकालो। आप जरूरत देखो — कहां जरूरत है, वहां दो। भगवान के नाम से तो लोग भीख मांगते हैं, क्वार्टर (दारू) मांग के पी लेते हैं; आप ऐसे लोगों को मत दो। आप देखो कि देने के पहले वो व्यक्ति क्या कर रहा है, और उसके कार्य में सहयोग दो — और (वह) आप ही के लिए तो कर रहा है। आज आप यहां पे आए हो — आप कितने अच्छे से जीवन जी रहे हो; इतने अच्छे से तो आप अपने घर पे नहीं जी रहे हो, जहां पर आपने कर्ज कर लिया। एक व्यक्ति ने इस स्थान को कैसा बना दिया है कि आपको यहां कुछ सोचना ही नहीं है — सोचो जरा। और (वह) कह रहा है — आजीवन रुको। लेकिन बड़प्पन से काम थोड़ी ना चलेगा; व्यवस्था के लिए पैसे तो चाहिए — आप वो सोचो जरा। व्यवस्था के पीछे अपना तप है; 12 साल तक हमने क्या किया — मैंने अपने आप को उस लायक बनाया ना, ज्ञान से, धन से, समझ से। तो रहो भैया, आजीवन रहो, लेकिन अपने आप को परेशान मत रखो। लाख रुपए पाने के बाद अगर परेशान हो, तो समाज के लोगों को शर्म आने लगेगी। (कहते हो) बहुत मस्ती में हो — और मस्ती में हो, तो जब सत्संग कराने को बोला, तो बोले मैं उस लायक नहीं हूं — तो मस्ती कहां गई? जीवन में (ऐसे) सत्कर्म करो, जिससे समाज को भी लाभ हो और आपको भी लाभ हो। अब जैसे एक व्यक्ति ने कहा मैंने भंडारा कराया — तो मैंने उसे ज्ञान का भंडारा कराने के लिए बोला था। जिसको तूने खाना खिलाया, उसे क्या खाना नहीं मिल रहा था? क्या जिसको खाना खिलाया, वो भोजन नहीं कर रहे थे? और एक दिन भंडारा करने से — अगर एक दिन सब उपवास ही रख लेते, तो क्या हो जाता? तो बड़ा खुश है, बता रहा है कि मैंने भंडारा करा है — तो उस भंडारे का क्या मतलब? ऐसे ही अहंकार को लोग पोषण देते हैं। अब तुमने कहा कि तीन दिन के सत्संग का मैंने लाभ लिया — अब गोयल जी हमें ना बुलाकर, सत्संग ना करवाकर, भंडारा ही करवा देते, तो तुमको क्या लाभ होता? तो समझना चाहिए कि मैं क्या कर रहा हूं, और उससे समाज को क्या लाभ होगा। भंडारे से कुछ होने वाला नहीं है। और आपको एक बात बता दूं — भंडारे में जरूरतमंद कभी नहीं खा पाता; जरूरतमंद तो बेचारा रास्ता देखता रहता है, उसे बचा-खुचा दिया जाता है; एकदम सेठ लोग खाते हैं। भंडारे का कोई मतलब नहीं है। अगर भंडारा ही कराना है, तो ज्ञान का भंडारा कराओ, जिससे आत्मिक कल्याण हो। भंडारे में हमेशा ये (अच्छे) कपड़े पहने रहते हैं, वो खाते हैं; बचा-खुचा लास्ट में भिखारी की तरह लोग दे देते हैं, और वो लोग खिलाकर ये सोचते हैं कि हमने बहुत बड़ा पुण्य किया — हां, तेरे अहंकार को पोषण दिया, तो पुण्य किया ना! (और जो खाने आते हैं, वे) वीवीआईपी हैं, सोचेंगे कि मैं अपने घर पे खाना छोड़ के आ रहा हूं, एहसानमंद बन मेरा। तो भंडारा कराना है, तो ज्ञान का भंडारा करवाओ — या तो खुद करो, या तो कोई कर रहा है तो उसमें सहयोग दो, या तो खुद आत्मज्ञान को उपलब्ध होकर ज्ञान का भंडारा करवाओ।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01