प्रश्नोत्तर P4-0085 · भाग 4
(लाइव) योगी जी प्रणाम। जब 'कुछ न चाहने' की अवस्था आती है, तब जो स्थिति बनती है क्या वह परिवर्तनशील रहती है, या फिर उसके आगे और कोई आयाम है जहां जिज्ञासा भी समाप्त हो जाती है?
जब कुछ नहीं चाहिए, अपने स्व में स्थिर होते हो, तो मूल केंद्र पे आते हो। अब तुम उस जगह पे आ गए कि इधर संसार है और इधर ब्रह्म है। और जब आप यहां से होके यहां पे आए, तब उसके बाद परमात्मा, ब्रह्म की यात्रा शुरू होती है — आत्मा की परमात्मा की यात्रा शुरू होती है। अभी क्या यात्रा चल रही है? अभी तो यात्रा चल रही है कि मैं अपने आप को कैसे छुड़ाऊं। अभी तो केंद्र पे आना है आपको; उसके बाद परमब्रह्म की यात्रा — आत्मा और परमात्मा की — शुरू होगी। अभी तो आपने जिस दुनिया का निर्माण किया है, उस दुनिया से अपने आप को छुड़ा रहे हैं। अपनी बनाई हुई दुनिया में राग-द्वेष में पूरी तरह उलझ गए हो, और अब आपको अच्छा नहीं लग रहा है, अब वहां से हटना चाह रहे हो। लेकिन लोग कह रहे हैं — जाओ तुम, लेकिन मेरा हिसाब करो। अब हिसाब-किताब (करने को) बैलेंस उतना नहीं है अपने पास कि हम एक बार में हिसाब कर दें। 20 साल से लेनदेन कर रहे थे और बड़े माइनस में चले गए; तो एक झटके में कहां से हिसाब करोगे? 20 साल का अगर दो साल में भरना है तो मेहनत भी तो वैसी (करनी होगी)। इसीलिए सत्कर्म — और ऐसा सत्कर्म कर दो कि सामने वाला, जिसका हिसाब-किताब करना है, आपके सत्कर्म से खुश हो जाए, कहे — यार, सब माफ करो इसका, इसे छोड़ो।
अब यह माफी कब होगी? जब देखा जाएगा कि आपने स्थिति-परिस्थिति के वशीभूत होकर गलत किया। सजा के पहले पूरी जांच होती है कि भाई, आपने किस स्थिति में अपराध किया, अपराध का कारण क्या है — तो माफी भी दी जा सकती है। अब अपराध किस स्थिति में किए हो, यह अपने को देखना है, क्योंकि अपराध करने वाला तो मैं हूं। कुछ तो ऐसे अपराध हैं जो मेरे अलावा कोई जानता ही नहीं — जिसके साथ किया, वो भी नहीं जानता। जैसे दो साल के बच्चे के साथ लोग गलत कर देते हैं — उस बच्चे को थोड़ी पता है उसके साथ क्या हो रहा है, अबोध है ना; वो किसी को बता भी नहीं पा रहा; लेकिन अपराधी को तो पता है। आपने पेपर में न्यूज़ में देखा होगा कि एक पागल औरत ने बच्चे को जन्म दिया — क्या उसे पता है कि उसके साथ क्या हो रहा था? किसी व्यक्ति ने ऐसा किया होगा ना, तो उस व्यक्ति को तो पता था मैं क्या कर रहा हूं। उस औरत को तो कोई पता नहीं है, वो बस एक पीड़ा से छटपटा रही है, हो सकता है वो श्राप भी ना दे पाए। तो कुछ अपराध का सिर्फ हमें ही पता रहता है — लेकिन आपके अलावा भी कोई है। इसीलिए तो लोग कहते हैं कि यार, बड़ा अच्छा आदमी है, बड़ा सज्जन आदमी है, और बहुत भोग रहा है — क्योंकि वो अपराध दिख नहीं पाया ना। ना हमारे घर वालों को पता है, ना जिसके साथ किया उसे पता है, सिर्फ मुझे पता है। और जब समझ जगती है, तब पश्चाताप की आग लगती है, और उसी का जाके हम एकांत में सामना करते हैं; फिर सामना हो नहीं पाता, छटपटाते घूमते हैं, कह भी नहीं सकते किसी से। इसीलिए मेरा कहना है कि भैया, सत्कर्म में लग जा। तूने एक नहीं, कितने अपराध किए हैं, तुझे खुद पता तो है। मेरा तो यही कहना है — भैया, ईमानदारी-सत्कर्म अपना के निकल। ज्यादा होशियारी मत करो कि यार मैंने तो कुछ नहीं किया। जज के सामने जितना भी कहोगे कुछ नहीं किया, उतना रिमांड पे जाओगे — ये कबूल ही नहीं रहा है, तो रिमांड पे रिमांड। और जब कबूल दिए तो कहेगा, एक सजा दे दो। फिर क्या करें? भोग। अब तुम जेल में जाके अगर बहुत सत्कर्म के साथ जीवन जी रहे हो, और ऐसा जीवन जी रहे हो कि जितने लोग वहां हैं, सबने कहा कि सच में सज्जन व्यक्ति है, तो हो सकता है जेलर खुश हो के कहे — यार, लेटर लिख दो, इसकी कुछ सजा माफ करो। इंक्वायरी आएगी, कुछ सजा माफ हो जाएगी।
अगर आप वैसे निकले — तो जैसे गुरु शंकराचार्य ने देखा कि शिष्य की प्रबल जिज्ञासा है। क्या जिज्ञासा? ज्ञान की नहीं — समाज कल्याण की, कि गुरु जी का ज्ञान समाज तक पहुंचेगा, समाज का कल्याण होगा। उस शिष्य का अपना कुछ नहीं था, उसे बस एक ही चिंता थी — गुरु जी का ज्ञान। पहले लिपिबद्ध नहीं था, गुरु शिष्य को कंठस्थ कराता था; अब वो शिष्य ऐसा था कि उसे कंठस्थ ही ना हो। तो उसे एक टेंशन रहती थी कि मैं गुरु जी के काम कैसे आ जाऊं; उसे ज्ञान नहीं चाहिए था। वो हमेशा गुरु के आसपास रहता था कि गुरु जी अगर आवाज करें तो मैं पहुंच जाऊं। एक दिन शंकराचार्य जी सबको ज्ञान देने के लिए बैठे थे, शिष्यों ने कहा गुरु जी शुरुआत करें, तो बोले — नहीं रुको, अभी वो नहीं है। बोले — उसके होने और न होने से क्या फर्क है, उसे तो कुछ आता ही नहीं। बोले — नहीं। फिर वहीं से वो देखे तो वो वहां पे कपड़ा धोते-धोते चिल्ला रहा है कि गुरु जी का ज्ञान कैसे पहुंचेगा, कैसे पहुंचाऊंगा, मैं क्या करूं। तो गुरु जी ने कहा — चल, मैं तुझे यहीं से ज्ञान देता हूं, और वो आया, उसे वो ज्ञान तुरंत हो गया। तो गुरु में सामर्थ्य है। जैसे आठ पिल्ले हैं, एक नहीं खा पाता, तो मैं सबको बिस्किट खिलाता हूं, पर उसको गोद में ले के खिलाता हूं। क्यों? तो गुरु की नजर जरूरतमंद पे है, वो देखता है कि जरूरत किसको है, उसके पीछे वो भागता है। आपकी चमक-धमक में पड़ने वाला नहीं है। आप ये मत समझना कि आप अपना बैकग्राउंड बता दोगे — जितना तुम अपनी चमक दिखाओगे, उतना गुरु से दूर होते चले जाओगे। गुरु आपकी जिज्ञासा को देखता है, आपकी चमक-धमक को नहीं, क्योंकि वो चमक-धमक से मुक्त हो चुका है। गुरु आपके चापलूसी भरे शब्दों को नहीं देखता — जितना तुम बोलोगे, उतना हंसेगा। वो सिर्फ आपकी जिज्ञासा को देखता है, और वो जिज्ञासु के पीछे भागता है। और ऐसा नहीं कि वो शरीर से आए — उसमें इतनी सामर्थ्य, इतना बल है कि वो कहीं से भी बैठ के कर सकता है।
आप जरा बाहरी सिस्टम को समझो। अभी ये मोबाइल आपका चल रहा है; एक ऑपरेटर वहां बैठा है, एक बटन मारे तो नेटवर्क गया — वहीं से बैठ के कनेक्शन काट दिया, आपका मोबाइल छूने की भी जरूरत उसे नहीं है। ऐसे आंतरिक शक्तियां काम करती हैं। लेकिन वह ड्यूटी उसे मिली है, उसकी योग्यता के अनुसार; आप चाहो तो काट दोगे क्या किसी का? एक सेकंड में आपके पूरे फोन का नेटवर्क खत्म — अब तुम टावर पे चढ़ के भी मिलाओगे तो नेटवर्क नहीं आएगा, कनेक्शन कट चुका है। वहां बैठ के आपके नेटवर्क को बढ़ा-घटा सकता है, जबकि मोबाइल आपके हाथ में है, सिम आपके हाथ में है। तो यहां कुछ भी चल रहा है, उसके पीछे कोई आधार, बेस काम कर रहा है — आप ये ना समझना कि ऐसे ही चल रहे हो, बोल रहे हो; इसके पीछे कोई एनर्जी काम कर रही है। और जैसे ही वहां से वो कनेक्शन (काटता) है, तो कहते हैं यार मर गया — अब हाथ नहीं हिलेगा। और देखिए, आप जितने फोन करते हो, जितना WhatsApp करते हो, पूरी जानकारी उस सिस्टम के पास है। कौन सा तार जुड़ा है आपके मोबाइल से? दिख रहा है क्या? नहीं ना? लेकिन आंतरिक कुछ जुड़ा है। यह भी तो एक तरह की यांत्रिक शक्ति है। मैंने आज कहा ना — ये पूरा ऊर्जा है। लेकिन अब नेटवर्क है और आपने फ्लाइट मोड पे मोबाइल रख दिया, फ्लाइट मोड खोल ही नहीं रहे हो, और टावर पर जाके बैठ रहे हो कि यार नेटवर्क कैसे मिले — नहीं मिलेगा। कहीं ना कहीं गड़बड़ी है।
जैसे हम कल गाड़ी में बैठे, तो हमने अपने फोन का हॉटस्पॉट चालू किया, वहां वाईफाई कनेक्शन दिखा दिया, लेकिन कुछ चल ही नहीं रहा। तो मैं बटन दबा रहा हूं, फिर रिस्टार्ट किया, फिर भी नहीं। बोला यार गड़बड़ी कहां है? तो मैंने मोबाइल को देखा — डाटा ही बंद था। जैसे ही डाटा चालू किया, उसने पकड़ लिया। मैं कितना समय परेशान था, और वो मेरे हाथ में ही था। तो तुम्हारे हाथ में ही है — हमारे अंदर बटन है, तुम्हें बस एक बार दबा देना है, और तुम परम आनंद में हो जाओगे। लेकिन तुम वहां पहुंचो तो ना दबाओ — तुम तो कहीं और हो। तुम्हें अनेकों का बटन दबाने में मजा आ रहा है; तुम बहुत लोगों का बटन दबाने के चक्कर में हो, दिन-रात किसी ना किसी का बटन दबा रहे हो, बस अपना बटन नहीं दबाना है। जब अपने में जाओगे, तब ना बटन दबाओगे। तो जब तुम्हें दूसरे से फुर्सत मिले, तब ना तुम अपने में जाओ। मतलब आत्मज्ञान — जैसे आप बल्ब चालू (करते हो)। ऐसा नहीं कि मेहनत आप नहीं कर रहे हो — कर रहे हो, लेकिन किसी और के लिए; बटन तो दबा ही रहे हो, लेकिन किसी और का। और उस बटन दबाने से हमें राग-द्वेष मिलता रहता है, और बड़ा मजा आता है — राग-द्वेष का भी अपना मजा है। तो इस मजे से जब मुक्त हो जाओगे, रस भरी बातों से जब मुक्त हो जाओगे, तब आप अपने में आओगे ना। कैसे भी अपने आप को राग-द्वेष से छुड़ाओ, और इस पर आपको आत्मिक चिंतन करना पड़ेगा। आंख बंद करने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए आपको ईमानदारी-सत्कर्म, उसके बाद कोई काम नहीं है, तब बैठो — तब कोई मतलब है।
ईमानदारी-सत्कर्म — देखो, जहां मैं हूं, वहां मेरी जरूरत है; उस जरूरत में अगर आप काम आ गए तो कितने लोगों का आशीर्वाद मिल जाएगा, और फिर इसके बाद आपकी यात्रा और तेजी से (चलेगी)। पता चला आपकी जरूरत है, और आप कहीं और हो, और आप वो कर सकते हो, तो आप तो गिर रहे हो। क्योंकि कर्म ही बंधन और कर्म ही मुक्ति ले जाएगा ना। जिस चाबी से ताला बंद होता है, वही चाबी खोलेगी — बस बंद करते वक्त अलग तरीके से घुमाया, खोलते वक्त (उल्टा)। जैसे ले गए थे, वैसे वापस आओगे। कर्म से आप भटक गए थे, तो कर्म करके वापस आ जाओ — कितना सरल रास्ता है। लेकिन तुम्हारी आदत है — बैठूंगा। क्या करोगे बैठ के? जरूरत है, कुछ काम कर देते। अपने आप को सत्कर्म में लगाओ, सेवा में लगाओ, तब जाके कल्याण होगा। आप भटके कैसे हो? कर्म से ना? तो कर्म से ही छुटकारा मिलेगा। अगर आप काम कर लिए, तब जाके आत्मिक चिंतन करो, तब बढ़िया से होगा। लेकिन हमारी जरूरत है और मैं उसको छोड़ के आत्मिक चिंतन करूं, तो आत्मिक चिंतन थोड़ी ना होगा। तो ईमानदारी-सत्कर्म अपनाओ और अपना कल्याण करो। कर्म से अगर बंधन हुआ है तो कर्म करके ही आप छूट सकते हो। ताला अगर ऐसे बंद हुआ है तो बस ऐसे ही फिर आना है — उसी केंद्र पर आओगे, और जहां से चाबी निकाले थे, वहीं से डालना पड़ेगा; और जैसे बंद किए थे, एकदम वही करना पड़ेगा। जिस स्पीड से भागे, उसी स्पीड से वापस आना है, उसी जगह पे, यहां से फिर शुरुआत। तरीका तो वही अपनाना पड़ेगा। हो सकता है कि तुम कितने समय के बाद ताला खोलने गए हो, बहुत जंग लग गया हो, तो वो झटके से चाबी नहीं घूमने वाली है। साफ करो। जब ताला पूरी तरह साफ हो जाएगा, तब जाके खुलेगा — और साफ सत्कर्म से होगा। अब कितना जंग लगा है? कितने साल बाद खोलने जा रहे हो? (जैसे बोलते हैं ना, जन्मों-जन्मों का) — तो मैं कह रहा हूं, सफाई में तो लगो। ईमानदारी चाबी है — ईमानदारी की चाबी लगा दो और सत्कर्म अपना लो, धीरे-धीरे खुल जाएगा।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25