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प्रश्नोत्तर P4-0172 · भाग 4

(कुटिया में चार दिन रहे एक साधक-शिक्षक ने अपना अनुभव बताया) यहां इतने कम संसाधनों में भी साधक सुखी रहते हैं, आवश्यकता में जीते हैं; और हम आवश्यकता से अधिक में जीकर भी बेचैन रहते हैं। यहां की व्यवस्था के बारे में आप क्या कहेंगे?

यहां जितनी जरूरत है आपकी जिंदगी में, दुनिया में कहीं भी रहो, वो यहां पे है; यहां कमी कुछ भी नहीं है। आपके घर पर जितनी भी व्यवस्था है, ज्यादा से ज्यादा मान के लिए है। उपयोग आप जितना यहां करते हो — इतना चार दिन में आपने किया है — वही घर पर भी करते हो; बस मान के चक्कर में आपके बिस्तर बदल गए हैं, आपके कपड़े बदल गए हैं, बोलचाल बदल गई है। यहां कम नहीं है, ना तो ज्यादा है — यहां जितनी जरूरत है, उतना है, और इतनी ही जीवन की जरूरत है। बाकी जितनी भी जरूरतें आपने बनाई हैं, वो सिर्फ आपके मान के चक्कर में हैं। जरूरत सिर्फ आपको इतनी ही है। अगर कम होता, तो फिर आपको (ये) अनुभव नहीं होता, वो कमी आप बताते। चार दिन रहे, कभी आपको लगा कि शरीर में कोई कमजोरी आई? वहां से ज्यादा (ऊर्जा की) पूर्ति आपको यहां (हुई), एनर्जेटिक (रहे) — मैं आपको बताता हूं क्यों: क्योंकि आपके शरीर को जितनी ऊर्जा चाहिए, आपको मिल जाती है चना-मूंग से और यहां के भोजन से। अब घर पर आप क्या करते थे? अपने शरीर में ज्यादा भोजन डालते थे, तो वो पचाने में ही थक जाता था, पचाने में ही ऊर्जा खर्च हो जाती थी, तो शरीर पूरा थक जाता था। यहां उतना दिया जाता है, जितनी शरीर को ऊर्जा चाहिए, (ताकि) आप सही तरीके से उसका उपयोग कर पाएं। जहां आप ज्यादा समझ रहे हो, कमी वहां है, लेकिन वो आप देख नहीं पा रहे हो, और वह व्यवस्था आपको रोगी बना रही है। ये व्यवस्था आपको साधक बनाएगी, ये व्यवस्था आपको जिज्ञासु बनाएगी, ये व्यवस्था आपका आत्मिक कल्याण करेगी — इस व्यवस्था में आप कुछ कर पाओगे। मैं आपसे पूछ रहा हूं — आप चार दिन यहां रहे, जैसा अनुभव आपने यहां किया, क्या आप घर पर कर सकते हो? (नहीं।) वहां व्यवस्था यहां से ज्यादा है — तो व्यवस्था में अनुभव नहीं होता है। तो अगर हमने कुछ बनाया है, कुछ समझ के बनाया है। मैं इसीलिए कहता हूं कि आप ही लोगों के लिए बनाया गया है। जब भी आपको जीवन में मौका मिले, कम से कम एक महीना तो 12 महीने में अपने आप को दो; ज्यादा मिले तो भी दो; और आकर इस जगह का उपयोग करो, और बस यहां के नियम में जियो। नियम आपको सब समझ में आ जाएंगे, अगर मैं नहीं भी हूं — क्योंकि आने वाले समय में ये शरीर मेरा नहीं रहेगा। मैंने जितना ये नियम बनाया है, बस उसमें मिलावट ना हो — मिलावट ना करो। मैं जितना बचाया हूं, अगर उसमें आप रहोगे, तो उस रहने में (ही) आत्मिक (कल्याण होगा) — जैसे आपने अलग से कुछ क्रिया थोड़ी नहीं किया, आप बस इस नियम में रहे ना; हमने आपको आते ही सचेत कर दिया। यहां का जैसा सिस्टम बनाया गया है, अगर आप उसमें रह गए, तो इसमें रहने में आत्मिक कल्याण हो जाएगा — पूरी तरह, जब 101% रहोगे तब। अगर आप कहो 99 हूं, एक नहीं, तो आप फिर हो ही नहीं। तो जब भी मौका मिले, जब भी आपको छुट्टी मिले, ये जगह तो है ही, जगह कहीं जाने वाली नहीं है, मैं रहूं या ना रहूं। आप आके नियम तो समझ भी लिए हो, किसी से पूछने की जरूरत नहीं है, तो आप इसी में रहना। यहां का कोई मालिक भी नहीं है — यहां का कोई मालिक दिखा आपको? यहां का सिस्टम ही मालिक है। अगर उस सिस्टम में रहे, तो आप ही मालिक हो; और उस सिस्टम में नहीं रहे, तो आप निकाल दिए जाओगे — मतलब आप खुद अपने आप को निकाल दोगे, आपको खुद समझ में आ जाएगा कि मैं यहां रहने लायक नहीं हूं।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30