प्रश्नोत्तर P4-0176 · भाग 4
(कुटिया में गोयल जी) कभी संभल जाते हैं, कभी गलती हो जाती है, कभी भटक जाते हैं — क्या करें?
मैं तो कह रहा हूं, अपना कल्याण करो — कैसे भी, अपने आप को निकालो, और जिस लिए गए हो, वही काम करो। हम बस कहीं (और) लग जाते हैं ना। जिस लिए गए हो, वही काम करो।
राजा जनक की एक कहानी है — एक महात्मा थे, उनके पुत्र ने 12 साल तक तप किया; तो आए, तब 12 साल का अहंकार (था); बोले — पिताजी, किसको गुरु बनाएं, कोई है इस संसार में? बोले — हैं, राजा जनक हैं, विदेह हैं, जाओ उन्हें बनाओ। तो जैसे ही पहुंचते हैं, दरबार में बोलते हैं, तो कक्ष के बाहर बैठा देते हैं। तो देखते ही कहता है — अरे यार, मैं किस भोगी के पास आ गया! 12 साल तपस्या किया, पिताजी ने किसके पास भेज दिया! लेकिन पिताजी ने कहा है कि जाओ, वो समझा देंगे — तो पिताजी की बात तो माननी पड़ेगी; लेकिन अंदर से खीज आ रही थी कि 12 साल का तप है, मैं ब्रह्मचारी, ये कहां भेज दिया मुझे। कुछ देर बाद राजा जनक ने अंदर बुलाया — आओ। और जैसे ही अंदर आके बैठा, (खबर आई कि) राज्य में आग लग गई। बोले — ठीक है, बुझाओ, कोई बात (नहीं)। फिर कुछ देर बाद (खबर) आई कि आपके कमरे में भी आग लग चुकी है। (इतने में वो पुत्र) तुरंत उठा; (जनक ने) गट्टा पकड़ा, बोले — कहां जा रहे हो? बोला — लुटिया-कमंडल बाहर है, जल (ना) जाए। तो (हाथ) छोड़ा, बोले — जा, 12 साल और (तप कर); लुटिया-कमंडल से भी प्राण छूटे नहीं, अभी लुटिया-कमंडल में अटका है। तो समझ रहे हो? हमारी हालत बहुत विचित्र है। हम जिसके लिए गए हैं, वो क्यों नहीं दिखता मुझे? हमें तो सिर्फ उतना ही देखना चाहिए।
पांचों पांडवों से (परीक्षा में) — सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हुए, कैसे हुए? चिड़िया बनाई गई, तो पूछा कि भाई, क्या दिख रहा है? (सबको) ये दिख रहा है, वो दिख रहा है; तो (अर्जुन ने) कहा कि आंख दिख रही है; तो बोले — मार दो, हो गया। सबको इधर-उधर (दिखा), तुम्हें अपना लक्ष्य दिखा; और लोगों को क्या दिखा — ये दिखा, वो दिखा, बाद में आंख दिखी — लक्ष्य बाद में दिखा, तो लक्ष्य तक पहुंचोगे कहां? तुम्हें तो लक्ष्य बाद में दिख रहा है, पहले तो तुम्हें बहुत कुछ जांचना है। तो भैया, जिसको लक्ष्य सीधा दिखता है, और लक्ष्य के अलावा कुछ नहीं दिखता, वही लक्ष्य पे पहुंचता है। आपके पास अनेक ऑप्शन हैं। हम तो जिसके लिए आए थे, वो कर ही नहीं रहे हैं, कर कुछ और रहे हैं — इसी में हमने अपने आप को उलझाया है। जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछ रहे हैं; मुझे खुद नहीं पता मुझे जाना कहां है। तुम अपनी ऊर्जा कहां लगाओ — ये ऊर्जा है ना, आप अनेक जगह लगाओगे, तो आप जिसके लिए आए थे, वो कर ही नहीं रहे होगे।
जैसे उस व्यक्ति ने इनसे कहा कि उन्हें (गुरु जी को) आत्मज्ञान नहीं हुआ — वो तो मुझसे भी पूछा था — तो भैया, तू तो आत्मज्ञान के लिए आया ही नहीं था। तूने तो कहा — ना मुझे ज्ञान चाहिए, ना धन चाहिए, ना दौलत चाहिए, मुझे तो बस आपकी सेवा करनी है और आपकी सुरक्षा करनी है। उस दिन वो कार में इंदौर जाने वाला थोड़ी ना था — वो तो इसलिए गया कि (कोई) मुझे (गुरु जी को) कुछ ना कर दे, मार ना दे। हम बोले कि ये गाड़ी (वाले) चले जाएंगे, तुम मत जाओ; तो कुछ देर बाद कहा — नहीं, मैं चल रहा हूं; क्यों चल रहे हो? (कि) सुरक्षा के लिए। तो अब वो सुरक्षा करने वाला ही शत्रु बन बैठा — सबसे तगड़ा शत्रु दुनिया में वही है; हमारे 800 से ऊपर वीडियो को इसने इधर से उधर कर दिया। और सबसे ज्यादा वो (सच्चाई) दिखाता था, इसलिए मैं कहता था कि सच्चाई तो उसके अंदर है; लेकिन जब उसने खुद कहा कि मैं आपको बोलता था कि आप में ईमानदारी-पवित्रता है — तो उसको मैं कहता था कि उसके अंदर सच्चाई है, लेकिन ईमानदार मैं (नहीं कहता था)। सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है; अगर कोई सच्चाई पे है, तो वो झूठ पे भी चल (सकता है)। आज देखो, सबसे ज्यादा नुकसान वही पहुंचा रहा है — लेकिन मुझे थोड़ी पहुंचा पाएगा; तू समाज को पहुंचा रहा है, तो उसका रिटर्न तुझे मिलेगा। क्योंकि वीडियो से समाज का कल्याण हो रहा था — आज जितने लोग यहां बैठे हैं, वो वीडियो से ही बैठे हैं ना। समाज का कितना नुकसान कर रहा है, तो लाखों-करोड़ों की बद्दुआ तुझे खा डालेगी, तुम्हें बर्बाद कर देगी। तुम्हें समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं क्या कर रहा हूं। तो (जिस) व्यक्ति ने कहा कि तू बहुत पछताएगा — तू पछताने वाला काम भी कर रहा है।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30