आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P4-0186 · भाग 4

(वही साधिका) मार्केट में नकली ज्यादा पॉलिश करके बिकता है, चाहे अध्यात्म ही क्यों ना हो; असली थोड़ा डर्टी भी दिख सकता है। असली और नकली (गुरु/ज्ञान) की पहचान कैसे की जाए?

अगर आप कुछ लेने गए हो, तो उसके बारे में आपको पूरा नॉलेज, पूरी जानकारी होनी चाहिए; और जब पूरी जानकारी होगी, तो आपको कोई भटका नहीं सकता। लेकिन आप बिना जानकारी के गए, तो सही भी होगा तो आपको कैसे पता चलेगा? अगर मान लो असली होगा भी, तो आप कैसे उसे परखोगे? क्योंकि नकली उससे अच्छा दिखा के बेच रहा है, और असली वाला तो कुछ नहीं कहेगा — लो, चाहे ना लो, जाओ। नकली वाला आपको बहलाएगा, फुसलाएगा, अनेक तरह का आश्वासन देगा; और असली वाला कहेगा — आपको लेना है लो, नहीं (तो) जाओ, भागो। इसलिए कि नकली को तो कोई मेहनत करना नहीं पड़ा — वो फटाफट गया, अपना आवरण बदला, और फट से अपना (बोर्ड) लगा के बैठ गया; असली ने तो पूरी जिंदगी लगा दी। वो तुम्हें (क्यों) झेलेगा? तुम्हें भगा देगा — चलो, हम जिज्ञासुओं के लिए बैठे हैं, हमें भीड़ की जरूरत नहीं है। वो भगा देगा, क्योंकि तुमसे उसका अस्तित्व नहीं है। नकली का अस्तित्व तुमसे है — उसे भीड़ चाहिए, क्योंकि तुमसे उसका अस्तित्व है, उसे लग रहा है मैं कुछ हूं। और असली को पता चल गया कि मैं कुछ नहीं हूं, और मैं हूं तो हूं, मेरा अस्तित्व मुझसे है, इनसे नहीं है। और वो आपसे जवाब मांगेगा कि इतने दिन रहे तो क्या किए? कुछ हुआ या नहीं? नहीं हुआ तो जाओ — फिर क्या टाइम पास कर रहे हो बेमतलब का? जब आए, तब भी यही हाल था, अभी भी ये हालत — तो निकलो, फिर समय बर्बाद मत करो। और नकली कहता है — कोई बात नहीं, हम तुम्हें तारेंगे ना, तुम पड़े रहो। असली कहता है — नहीं, तुमको तरना पड़ेगा, हम तुम्हें नहीं तार सकते। नकली कहता है — कोई बात नहीं, हम तुम्हें तारेंगे, तुमको (ही) नहीं, तुम्हारी सात पीढ़ी को तारेंगे, तुम टेंशन ना लो, मैं जिम्मेदारी लेता हूं। नकली ही वहां टिकेगा ना — जिसे कुछ नहीं करना है, वो टिक जाएगा; उसे सात पीढ़ी तारने का आश्वासन देगा। और ये (असली) तो आपको (वो) भी नहीं देगा — कहेगा, देखो, मैं आपको मार्ग बता सकता हूं, तरना तुमको है। (समझ थोड़ी होती है कि नकली-असली को पहचान लें —) समझ नहीं है, तो घर पे रहो। कह तो रहा हूं — जानकारी लेके निकलो। शादी किए हो, तो समझ के साथ शादी किए हो ना? जब (पत्नी) पहली रात आई, तो क्या किए — पिताजी से कुछ पूछने गए? उसके साथ कैसे सोना था, पता था कि नहीं? इतनी जानकारी थी ना, तभी शादी किया ना — कि जाके पिताजी से पूछे कि बीवी तो ला दिए, अब मैं इसके साथ क्या करूं? जैसे तुमने शादी किया, तो पहले पत्नी के बारे में पूरी जानकारी ले ली कि पत्नी के साथ मुझे कैसे जीना है। उसी घर में एक मां भी है, बहन भी है — उनके साथ अलग तरीके से जिए; पत्नी एक रात आई, उसके साथ अलग तरीके से व्यवहार बनाया, जिया — तो नॉलेज था ना। शरीर तो एक ही है ना — जो हमारी मां-बहन में, वही हमारी पत्नी में भी था; लेकिन हम उसके साथ किस तरीके से जिए — तो नॉलेज के बाद शादी किए ना? तो ऐसे ही नॉलेज लेके आगे बढ़ो। पहले नॉलेज लो कि कहां जाना है, और मुझे क्या लेना है, मिलेगा तो मैं कैसे पहचान करूंगा। उसके बारे में पुस्तकों में अनेक जानकारियां हैं, महापुरुषों की अनेक वाणियां हैं। असली-नकली की पहचान तब करोगे, जब आपको, जो लेने गए हो, उसकी नॉलेज होगी — तभी होगी, नहीं तो नहीं होगी। बाजार में आलू खरीदने गए हो, तो आलू का नॉलेज होना चाहिए, और पूरी जानकारी होनी चाहिए, आधी-अधूरी नहीं। जानकारी का अगर अभाव है, तो आप ठगे जाओगे। और जानकारी बड़े आसानी से मिलती है — शास्त्र में, वेद में, उपनिषद में, वेदांत में अनेक महापुरुषों ने वाणी बोली है कि गुरु की पहचान कैसे करें, गुरु-शिष्य में क्या भेद है, शिष्य का भाव कैसा होना चाहिए — आप इसके बारे में अध्ययन करो। (वरना) तो नकली गुरु के पास भी जाएंगे, कहीं भी जाएंगे; कुछ भी मिलेगा, लेके चले आओगे। कैसे पहचान करनी है — बता तो रहा हूं इतने दिन से, और अभी भी वहीं अटके कि मैं कैसे पहचानूं? तो इतने दिन से क्या यहां घास छील रहे हो? अभी कुछ दिन पहले मैंने बताया ना कि गुरु की पहचान कैसे करें — अगर आपके आत्मिक कल्याण की हर वक्त बात कर रहा है, तो गुरु है; अगर भौतिक बढ़ाने के लिए बात कर रहा है, तो नकली है। तो अभी भी तुम वहीं खड़े हो? यहां समय बर्बाद करने आए हो क्या? अगर यह प्रश्न नहीं पूछते, तो कुछ आगे चलते ना हम; तुमने तो वहीं लाके खड़ा कर दिया, जहां आपको बताया था। जब हम कुछ बोल रहे हैं, तो उसे पूरी तरह पकड़ो ना। वही प्रश्न दोबारा करोगे, रोज वही प्रश्न — (नकली पकड़ के रखेगा, असली कहेगा लो या आगे बढ़ो —) लेकिन क्या लेना है? क्या तेल बेच रहा है? ज्ञान ना — तो फिर वही बात आ गई ना, आत्मिक कल्याण का मार्ग; वही बात घुमा के आ गई, तरीका अलग-अलग है। अगर आत्मिक कल्याण की बात करता है, तो गुरु है; अगर भौतिक की बात करता है, तो फिर वो नकली है। अगर वही प्रश्न रोज खड़ा करोगे, तो कोई मतलब है क्या? तब तो मैं आपके साथ समय बर्बाद कर रहा हूं। अरे, आप दिन भर चिंतन करते हो, तो आप अपने अंदर से प्रश्न पैदा करो ना। प्रश्न पूछने में अर्जुन कांप गए, रोने लगे — प्रश्न तुम्हारे अंदर से निकालना पड़ेगा। रोने लगे, चीखने लगे, चिल्लाने लगे, डर गए। आप रोज प्रश्न निकालिए ना — कोई तो हमारे सामने बोल रहा है (कि) मैं जवाब दूंगा — आप प्रश्न निकालिए ना नए-नए। आप चिंतन करते हो, तो देखो कहां खड़े हो गए, कहां रुक गए, क्यों घुटन हो रही, क्यों बेचैनी हो रही है, उसका क्या कारण है, क्या वजह है? ऐसे ही बैठ के सुन रहे हो। तुम्हें रोज एक-दो प्रश्न अपने अंदर से खोजने चाहिए, तब आत्मिक चिंतन का (आपको) उत्तर (मिलेगा)। अगर उत्तर देने वाला है, तो आप अपने सारे प्रश्न निकाल लो। आप देखिए, आपके प्रश्न कहां से खड़े हुए? समाज से खड़े हुए — ये आपके प्रश्न नहीं हैं। ऐसे ही समाज का कोई व्यक्ति उसका प्रत्यक्ष उत्तर दे देगा, तो क्या होगा? प्रश्न गिर जाएंगे, आखिर में आप बचोगे। लेकिन आप प्रश्न निकालो तो ना — प्रश्न आपको निकालना पड़ेगा, आपको खोजना पड़ेगा अपने अंदर। मैं 2011 से 19 तक प्रश्न पूछता रहा — मुझे चिल्ला के लोग भगा देते थे, रात-दिन प्रश्न ही करता था; मेरे प्रश्न ही नहीं खत्म होते थे, क्योंकि मेरे पास समय नहीं था; एक-दो दिन में, एक हफ्ते में मुझे भगा (देते थे)। आपको अंदर से प्रश्न निकालना पड़ेगा; और जब तक ये प्रश्न नहीं हटेंगे, तब तक आप मूल तक नहीं पहुंच पाओगे। इसे समझो जरा — प्रश्न आपके हैं भी नहीं, प्रश्न पैदा हो गए हैं — भ्रम। लेकिन वो प्रश्न गिरने चाहिए, हटने चाहिए; और तभी हटेंगे, जब आपको उत्तर मिलेगा। उस उत्तर का आपको कोई मतलब नहीं है — वो प्रश्न को गिराने के लिए है। आपको उत्तर नहीं चाहिए; आपके अंदर खुद ज्ञान है। आपको आत्मज्ञान खोजने की जरूरत नहीं है, आपको प्रश्न गिराने की जरूरत है। अब पूछो अपने आप से — जब प्रश्न गिर गए, तो मुझे फिर आत्मज्ञान क्यों नहीं हुआ? कहीं ना कहीं प्रश्न छिपे हुए हैं, मैं निकाल नहीं पा रहा हूं — इसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आप कुछ पूछ रहे हो, तो उसका आधार-बेस होना चाहिए; और अगर पहले बता दिया गया, तो फिर (नहीं पूछना)। कुछ पूछ रहे हो, तो उसका परिणाम आना चाहिए, आपके जीवन में बदलाव आना चाहिए। ऐसे ही मत पूछो — फिर हम आपसे पूछेंगे, आपको जवाब देना पड़ेगा। इसे समझिए — हम आपको समय दे रहे हैं, तो आप समय बर्बाद मत करिए। कल जवाब दे दिया, और पता चला आप वही पूछोगे, फिर आपके साथ हम बैठना नहीं पसंद करेंगे, क्योंकि मेरे पास समय नहीं है। 16 तक हम खूब बैठे, कोई महागुरु आया उसको भी झेला, सबको झेला; लेकिन अब नहीं। ऐसा ना हो, अब शाम को निकल रहे हैं, (फिर) पता चला हफ्ते में एक दिन कर दें। क्योंकि आप अगर समय बर्बाद करोगे, तो व्यक्ति अपनी जिंदगी जिएगा, सबकी अपनी लाइफ होती है, वो आपके साथ समय क्यों बर्बाद करेगा? आप घिसे-पिटे वही सवाल करोगे, कहीं पहुंच ही नहीं रहे, तो फिर आपके साथ समय क्यों? वो तो जिज्ञासुओं के लिए बैठा है। पहले मैं 16-18 घंटे देता था; अब देखो, शाम को निकलता हूं, क्योंकि लोगों ने उसका महत्व ही नहीं समझा। हम अपने आप में जिएंगे, या मेरे पास वो लोग रहेंगे, जो मुझे समझेंगे, जो मेरी भावनाओं को, मेरे समय को सम्मान देंगे, एक-एक सेकंड की कद्र करेंगे — हम उनके साथ रहेंगे। जब आपको हमारे समय की कीमत, सम्मान ही नहीं, तो हम आपके साथ समय क्यों बर्बाद करेंगे? कोई भी व्यक्ति वहां रहेगा, जहां वो खुश है। उसको थोड़ी नाम-पैसा चाहिए, उसे भीड़ थोड़ी खड़ी करनी है। हम जिज्ञासु के लिए काम कर रहे हैं — इसलिए कि मैं एक-एक प्रश्न के उत्तर पाने के लिए तरसा हूं, मैं समझता हूं वो व्याकुलता, वो तड़प। तब मेरे अंदर से भाव आया था कि जिसके लिए मैं इतना परेशान हुआ, इतनी तकलीफ सही, मैं जाके लोगों को दूंगा, बुला-बुला कर दूंगा — जो लोग मुझे समझेंगे, जो लोग इस ज्ञान को समझेंगे। जब आप समझोगे ही नहीं, तो हम आपके पास समय क्यों (दें)?

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17