प्रश्नोत्तर P4-0188 · भाग 4
(कुटिया में आई एक साधिका, जो चार साल से इस रास्ते पर है) मैंने पढ़ा कि आत्मा को ना जाना जा सकता, ना देखा-सुना जा सकता, तो उसके बारे में बात करना व्यर्थ है; बात तो इस अहम की करनी है जो 'मैं' और 'मेरा' कहता है। जब तक यह शरीर है, अहम भी साथ है — तो इस अहम से कैसे बाहर निकलें?
अहम आपके अंदर नहीं है — अहम आता है और जाता है। किसी भाषा में कोई आपको गाली दे दे, और भाषा समझ में नहीं आई, तो आपको अहम आएगा? नहीं आएगा। अहम आता है — आप किसी को गिराना चाहते हो, या आप किसी पे गुस्सा करना चाहते हो, तो अहम आता है, और अहंकार का रूप ले लेता है। जैसे मुंह में है, तो लार है; लेकिन जैसे ही बाहर आया, थूक हो गया। सामने वाले को गिराने की आपकी इच्छा है, और आपको बड़ा बनना है, तो अहम आता है, तो अहंकार का रूप लेता है। (तो इसको भी जानना पड़ेगा —) आपको अहम आता कब है, वो समझना है — किस स्थिति में आपको अहम आता है; वो स्थिति लानी नहीं। जैसे हमें किसी को गिराने का भाव छोड़ देना है, और हमें बड़ा बनने का भाव छोड़ देना है — तो अहम आएगा ही नहीं।
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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17