प्रश्नोत्तर P4-0190 · भाग 4
(वही साधिका) आपने अपनी यात्रा कैसे की — आप पहले क्या करते थे, और फिर एकदम से ऐसा जीवन कैसे बना लिया? पैसे की चिंता कैसे नहीं हुई?
मैं तो यात्रा की नहीं। (पहले) मैंने बिजनेस भी किया; आखिर में मेरा काम था ज्योतिष का, एस्ट्रोलॉजर — मुंबई में। तो मैंने उसमें देखा, देखते-देखते मैंने कहा, नहीं, इससे आगे निकलो। तो मैंने अपनी संपन्नता देख ली — कि नहीं, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए; मैंने देख लिया नाम भी, शोहरत भी, पैसा भी — इसका कोई जीवन में मतलब नहीं, इसके आगे भी कुछ है। तो खोज में निकल गया। खोज में निकला, तो मेरे पास पहले से लोग थे; उन्होंने कहा जितना भी आपका खर्च होगा, मैं आपको दूंगा — ऐसे लोग मिलते रहे मेरी जिंदगी में। तो मुझे कभी पैसे के लिए नहीं सोचना पड़ा। अगर मैं फटे कपड़े पहन के घूमा, तो वो मेरे काम का एक ड्रेस था। मुझे तो 2010 के बाद से ही ऐसे लोग मिले कि आप आश्रम बना लो, आप क्यों इतना घूमते हो, एक काम करो, कुटिया बना लो, वहीं आदमी रख देंगे, वहीं आपको भोजन बना के खिलाएगा, आप इतना क्यों घूम रहे हो। उन्हें समझ में नहीं आता था। कभी मिल जाते थे, कहते थे — ये हालत क्या बना ली है? बहन मुझे मिली, तुरंत एक ही बात — चलो, कपड़ा लो। मेरे पास कोई कमी ही नहीं थी, लेकिन (वो) मेरे काम का ड्रेस था। मुझे अपने आप को भी समझना था, समाज को भी समझना था — इसलिए कि मैं उस सोसाइटी में जाता था, जहां एक कपड़ा पहन के भिखारी भी नहीं जाते थे। तो जब मैं उनके साथ बैठता था, तो उनकी आंखों में देखता था — क्या मुझे शर्म है, संकोच है, क्या मुझे इनसे शर्म आ रही है? तो शुरुआत में आती थी; लेकिन धीरे-धीरे मैं उस लेवल पे लाया कि लास्ट (में) मेरी शर्म (खत्म हुई) — मतलब डर को खत्म करना। तो जब आप वैसे जाओगे, तभी ना। मैं उस हाई सोसाइटी में एकदम लो क्वालिटी का कपड़ा पहन के जाता था — तो जानबूझकर किया ना, जवाब पाने के लिए कि मेरे अंदर क्या है — इनका दबाव है, संकोच है, लाज है, शर्म है?
अभी मैं इनके साथ महाबलेश्वर गया था, मेरे कपड़े ऐसे ही थे, और हम लोग अच्छे तरीके से घूम रहे थे। अब होटल लेना था, तो होटल महंगा बता रहे थे; बोला — यार हेमंत, एक काम करो, होटल 600 से ऊपर नहीं देंगे। होटल का ज्यादा बता रहे थे, बोला — इतना पैसा क्यों देना, खा-पी के चलो, अपन कहीं सो जाते हैं, एक रात तो बीत (ही जाएगी), और कुछ अलग अनुभव होगा। वहां ठंड भी खूब है। तो हम एक मंदिर में गए, (सोचा) वहां रह लेंगे। मगर 600 से ऊपर तो नहीं देंगे, कुछ भी हो जाए — ये फिक्स मेरा रेट है। वो सीजन चालू था, ठंड का, बाहर देश से भी लोग आते हैं, तो वहां एक रूम का एक नाइट का 10,000 प्लस ही रेट था। तो एक माता के मंदिर में आरती हो रही थी, (हम) पहुंच गए, आरती हुई, प्रसाद लिया; फिर नीचे उतरे तो एक व्यक्ति था, हमने कहा — क्या यहां रूम मिलेगा? बोले मिल जाएगा। बोला — मिल तो जाएगा, लेकिन 600 से ऊपर एक रुपया नहीं दूंगा। बोले मिल जाएगा, (और) लेके चल दिया, एक होटल में गया। होटल वाले मुझे देख रहे हैं — उसने मुझे बाद में बताया कि होटल वाला पूछ रहा था, ये लोग मार-झगड़ा करके तो नहीं आए — मेरे कपड़े चिथड़े। वो बोल रहा है — नहीं, ये बहुत अच्छे आदमी हैं। वो मुझे जानता भी नहीं; उसने अपने रिस्क पे — क्योंकि वहां उसका घर था — कमरा दिला दिया। फिर उसने फोन नंबर ले लिया, फिर कहा सुबह का नाश्ता मेरे यहां। अभी भी उससे बातचीत होती है। फिर मुझे पूरा महाबलेश्वर घुमाया, खर्च करने ही नहीं दे रहा था — पूरा खर्च उसने किया, जबरदस्ती भी करो तो खर्च नहीं करने दे रहा था; अपने घर पे भी ले गया, अपने बच्चों से, पत्नी से मिलाया, नाश्ता करवाया; अभी भी फोन करता रहता है कि कब आओगे। तो अगर आप ईमानदार हो ना, तो आपको दुनिया में कोई भी मिल जाएगा। आप जैसे रहते हो ना, वैसे लोग आपके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। मैं आपको बता रहा हूं, मैं घूमा — (पहले) मैं पूरा एयर कंडीशन से घूमा, एसी के नीचे तो मैं बात ही नहीं करता था; (बाद में) मेरा रिजर्वेशन में टिकट करा दे, तो मैं कैंसिल करा देता था — शुरू में। मुझे कोई कमी ही नहीं हुई।
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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17