प्रश्नोत्तर P4-0200 · भाग 4
(वही साधिका) मैं अब जिस तरीके से बात करती हूं, मेरी मम्मी से बात ही नहीं हो पाती, वो सुनना भी नहीं चाहतीं। तो क्या बात ना करूं? अगर लगता है कि वो दुख में हैं, तो क्या उन्हें निकालने की कोशिश न करूं?
ठीक है, लेकिन कभी-कभी हमें उनके तरीके से भी बात कर लेनी चाहिए। जैसे मैं अपनी बहन को फोन करता हूं — वो प्रणाम करती है, 'गुरु जी प्रणाम'; (मैं कहता हूं) 'हां बोल, काहे फोन किए?' 'बस ऐसे याद आई।' 'अच्छा, और का हालचाल है? खाना खाई?' 'हां महाराज, खाए।' 'अच्छा, और ठीक बा?' 'हां, ठीक बा।' 'का बताई महाराज?' (मैं कहता हूं) 'अपन आत्मिक कल्याण कर।' 'हां महाराज, करब — पहले लड़कियन के टेंशन बा।' 'हां, टेंशन ले ले; जब टेंशन दूर हो, तब आई, तो कल्याण मार्ग बता देब, नहीं तो पड़ी रहो।' हम खूब बात करते हैं। तो वो तरीका कैसे आया? क्योंकि वो तरीका मेरे पास है, क्योंकि मैं उसमें जिया हूं, वो गया थोड़ी ना है। हम अपने आप को एडवांस बनाने के लिए वो तरीका उठा नहीं रहे हैं — और (जता रहे हैं कि) मैं तुमसे हाई हूं। कहीं ना कहीं हमें ये रहता है कि हमने बहुत ज्ञान ले लिया, अब मैं उसे जता रहा हूं कि तेरे-मेरे में अंतर है। (हमें लगता है वो दुखी है, परेशान है, तो उनको भी ये रास्ता मिले —) वो परेशानी में (भी) खुश है, कुछ परेशान नहीं है, वो मजे में है, मस्त है, उसे कोई टेंशन नहीं है। जब जरूरत पड़ेगी, तो खुद ही बोलेंगी। अरे, वो खूब बढ़िया मस्त है, तुमसे ज्यादा है।
(अगर लगे कि मां है इसलिए मुझे ऐसा लग रहा है, तो ये मोह हो गया ना?) तुम्हारी मम्मी को मम्मी नहीं कहोगी, तो क्या कहोगी? है ही है। (उससे ज्यादा) दाई तो बन जाएंगे। आदि गुरु शंकराचार्य अपनी मां के लिए नहीं गए क्या? अद्वैत का प्रचार कर रहे थे, लेकिन अपनी मां को तो जलाने गए, लास्ट (में)। जिससे हम जन्म लिए, तो एक ममत्व तो रहता है। (बुद्ध) खुद नहीं गए अपने पिता के पास क्या? पिता बीमार हुए, गए — और संसार में (कोई और) पिता बीमार नहीं दिखा उन्हें? समझिएगा इस बात को। अगर बुद्ध के पास समभाव (ही था), तो संसार में जितने पिता बीमार हुए, सबके पास जाते। व्यक्तिगत अपने पिता से मिलने गए कि नहीं गए? अरे, वो (भाव) कहीं नहीं जाता, चाहे ज्ञान हो जाए, चाहे कुछ भी हो जाए। जबरदस्ती हटाने की कोशिश कर रहे हो — आप एडवांस में आ रहे हो कि अब मैं बहुत हाई चली गई हूं। अरे भैया, उनके पास एक तरीका है, वो हाई नहीं आ पाईं; तुम्हारे पास तो दोनों हैं, तो तुम उनमें घुस जाओ ना, क्योंकि तुम्हारे पास वो तरीका छिपा हुआ है। उनको उठाने का तरीका भी आसान (होगा) — जब आप उनमें होकर बात करेंगी, तो आप उन्हें उठा सकती हैं। (हमें लगता है हम उनसे झूठा कर रहे हैं —) क्यों झूठा? फिर वही बात — आप सच-झूठ का निर्णय करने वाले कौन हो? आप भी तो उसमें कभी जी रही थीं — आप भी उसमें जिए हो कि नहीं? उनका भी समय आएगा, निकल जाएंगी। आपके पास दो तरीके हैं, उनके पास तो एक ही है — आप उन्हें क्यों खींचना (चाहती हो)? उनमें हो जाइए ना। निकालना क्यों है उनको? वो मस्त हैं ना। देखो, मैं (बहन से) इतनी बात करता हूं, मैंने कभी उसको (जबरदस्ती) कहा कि आजा? (बस) बोले — एक काम कर, कर ले आत्मिक कल्याण; (वो कहे) लड़कियन के टेंशन; हम कहे — ले ले टेंशन, कोनो बात ना, पूरा कर, फिर आइए।
(क्या ये चीटिंग नहीं — उन्हें वहीं रहने देना?) कहां चीटिंग है? जब उनकी वहां से समझ बढ़ेगी, तो वो खुद निकलेंगी; और जब उन्हें मेरी जरूरत होगी, तो खुद पुकारेंगी, मैं जाऊंगा। बल्कि बात करके मैं उसको ऑप्शन तो दे रहा हूं ना कि मैं हूं — आत्मिक कल्याण करना हो, तो आ जाना मेरे पास। हम जबरदस्ती क्यों करें? (हम जैसे लोग ही जबरदस्ती करते हैं, क्योंकि खुद को महान ज्ञानी समझते हैं —) हम तो आपको बताएं — हम पिल्लों के साथ बैठते हैं; अब पिल्ले को हम क्या ज्ञान दें — चल, तू भी आत्मज्ञानी हो जा? जब हम दिन भर पिल्लों की साफ-सफाई करते रहे, तो वो मुझे खूब चाट रहे हैं, और हम उनके साथ खो गए। अब हम उनको कहें — नहीं, मुझे समझ में आया, तू भी समझ; ले डंडा, चुप, समझ ज्ञान को अब! वो कहेगा — नहीं, तुम्हें चाटना है; अरे भैया, उसे तुम्हें प्यार करना है, उसकी स्थिति वही है। अभी हम मुंबई गए थे काम से, तो (बहन) के यहां थे — हम उसकी ही बात सुन रहे थे, हम थोड़ी ना वहां ज्ञान ठोक रहे थे; उसे क्या समझ में आएगा? उसे तो अपना टेंशन है — प्रॉपर्टी है, पैसा है, नौकरी है, बिजनेस है, व्यापार है, बेटे की बीमारी है, पति की बीमारी है — सुनते रहे। हम कहें — ठीक है रे, अपने कर्म का परिणाम है, भोग ले। और (हम) कहें — का बताई रे, हम खुद भोग-भोग के आगे जात हैं; देख हमारी स्थिति — ना पास पैसा-रुपया, ना परिवार, एक कपड़े पे हम जीत हैं, बुढ़ापे में एक गिलास पानी के देई — तबो देख, हम ज्यादा खुश हैं। तो वो हंसने लगी। ये सब जब बोल दो, तो हंसने लगती है। (उल्टा बोलना सीखना पड़ेगा?) नहीं, उल्टा नहीं — आप उसकी समझ से बात करो। आपके पास दोनों (तरीके) हैं — उस स्थिति में आप जी हो, वो आपके अंदर से गया नहीं है, जा भी नहीं सकता — तो आप उनके तरीके से बात करिए ना। फिर हमें क्या जरूरत है दिखाने की कि मैं ज्ञानी हूं? और कभी-कभी वो स्थिति बात-बात में आ भी जाती है, तो उस टाइम पे आप बता सकते हैं — (जैसे) मैंने कहा, भैया, अपने कर्म का फल भोग ले; (तो वो कहती है) हां महाराज, सही कहत हैं।
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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17