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प्रश्नोत्तर P5-0035 · भाग 5

समाधि का अनुभव कैसा रहता है? आत्मज्ञान के बाद आदमी गिर सकता है क्या?

जी नहीं। समाधि के बाद आत्मज्ञान होता है। अवधूत स्थिति के बाद होता है। समाधि अवधूत स्थिति में लगती है। समाधि आप ये मत समझिएगा कि वैसे बैठ गए और समाधि लग गई। समाधि चलते, उठते, जागते, बातचीत करते लगती है। समाधि एक ऐसी स्थिति है जहाँ राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता, खोज, अनुभव, ईमानदारी, बेईमानी, पाना, खोना, जागना, सोना, कुछ खोजना, कुछ नहीं रहता। उसे अद्भुत स्थिति भी बोल सकते हैं, उसे भयानक स्थिति भी बोल सकते हैं। अद्भुत कब होता है, होने के बाद। उस समय भयानक स्थिति रहता है। वही स्थिति भयानक है। अद्भुत कब लगता है, जब हो जाता है तो लगता है कि वही स्थिति बहुत अद्भुत थी। जैसे हम बचपन में कुमार होने के लिए एकदम व्याकुल रहते हैं। कब मूँछ आ जाए, कब दाढ़ी आ जाए। कभी-कभी तो मूँछ नहीं आता, चोरी से बना देते हैं। लेकिन आज हम बचपन के लिए तरसते हैं। बचपन की स्थिति गजब थी। वैसे समाधि की स्थिति भी गजब ही होती है। जब वो रहती है तो उससे निकलना चाहते हैं। कब निकल जाए। कुछ अलग ही होता है। और फिर वो चली जाती है तो लगता है कि क्या थी वो, जैसे बचपन चला जाता है। लेकिन बचपन में यही भाव होता है कि कब हम कुमार हों। यहाँ तक कि दाढ़ी-बाल आता नहीं, तो कभी-कभी बालक लोग चोरी से मूँछ बना देते हैं। उसके लिए मार भी खाते हैं घर का। जल्दी से जल्दी युवा होना चाहते हैं, और बाद में पता चलता है कि ये मेरे काम का नहीं, बचपन ही मेरे काम का था। तो आत्मज्ञान के बाद भी ज्ञान उसके काम का नहीं रह जाता, जिसके लिए इतना प्रयास किया, जिंदगी दाँव पर लगा दी। होने के बाद उसके काम का ही नहीं। बड़ी अजीब बात है। लेकिन उसके बाद ही उसकी यात्रा, परम यात्रा की शुरुआत होती है। एक शब्द भी उसके काम का नहीं रह जाता। तो ये होता है कि इतना प्रेम उसके अंदर होता है कि ये शब्द लोगों के काम के हैं। इसलिए वो अथाह मेहनत करता है। इस दुनिया में, इस पृथ्वी पर अगर सबसे ज्यादा कोई मेहनत करता है तो एक आत्मज्ञानी, जहाँ तक ये मेरा अनुभव है, और मैंने इतिहास पढ़ा है। और उसे कुछ नहीं चाहिए। तन पर फटा पुराना कपड़ा पहन के, पेट में रोटी खाकर, जो जैसा दे दे, और ज्ञान देते हुए निकल जाता है। पूरी जिंदगी मेहनत करता है। वो कभी किसी को नहीं कहता कि मेरे पास दूसरा आत्मज्ञानी चाहिए। उसको दूसरा आत्मज्ञानी नहीं चाहिए। किसके लिए मेहनत करता है। वो तो चाह रहा है पूरी दुनिया हो जाए। वो सोच रहा है पूरी दुनिया को हो जाए, सबको हो जाए। कोई अगर अच्छा शिक्षक है, तो वो सोचता है हर विद्यार्थी टॉप पर आए, तो उसे बड़ी प्रसन्नता होती है। क्या वो चाहता है कि मेरा कोई पढ़ाया हुआ विद्यार्थी फेल हो जाए। विद्यार्थी से ज्यादा दुख शिक्षक को हो जाता है, जब विद्यार्थी फेल होता है, अगर शिक्षक ने मेहनत की। उसका भाव है कि जितने लोग पढ़ें, सब टॉप में आएँ। तो ज्ञानी का भाव यही रहता है कि सब निकल लें। और सबसे ज्यादा मेहनत वो करता है। ये व्यक्तिगत मेरा अनुभव है। मैं खुद सोलह घंटे काम करता हूँ। सत्संग के बाद भी लाइव सत्संग खत्म होता है, कभी डेढ़ बजे, कभी दो बजे। इसके बाद भी यहाँ तीन-चार बज जाते हैं। और फिर सुबह सात बजे जाग जाता हूँ। उसके बाद वो चाहे तो भी नहीं गिर सकता। कैसे भी रहे, जनक की तरह रहे या सुदामा की तरह, वो नहीं गिर सकता। कभी हमें लोग बोलते भी हैं कि आपको तो आनंद में रहना चाहिए, क्या कर रहे हो। तो मेरा भाव ये है कि मैं अकेले गया तो क्या किया। कोई है ही नहीं। अभी हैं, जब तक हैं। ये सब उपलब्धि के बाद की बात है। सौ साल बाद ये लोग नहीं दिखेंगे। कोई भी सौ साल बाद कहीं और दिखेंगे। मैं ये नहीं चाहता कि ये कहीं और दिखें। ये मूल पर जाएँ। अगर ये ना दिखें तो बहुत अच्छा है। मैं नहीं चाहता कि सौ साल बाद ये कहीं और दिखें, और ऐसे ही बस बच्चे पैदा करें, बस वही इनकी जिंदगी हो, खाना और मल साफ करना, उसी में लगे रहें। मैं नहीं चाहता कि सौ साल बाद यही करें। ये मेरा भाव नहीं है। मैं चाहता हूँ कि इससे छूट जाएँ, मूल में चले जाएँ। बात यही है कि जब तक ये नहीं चाहेंगे, तब तक निकाल नहीं सकते। होगा ही नहीं। कोई भी नहीं करवा सकता। कृष्ण दुर्योधन के पास कितना गए, कितनी बार गए, क्या करवा पाए। नहीं करवा पाए। आप नहीं चाहेंगे तो नहीं। यही तो बात है। सत्कर्म और ईमानदारी जैसे ही आप शुरू करेंगे, आपने जो दुनिया बनाई हुई है, उसका पल्ला भी आपके ऊपर है। बड़ा मुश्किल है, और पता चल जाता है कि हम खुद नहीं निकलना चाहते। कम से कम आईना दिखा दिया। मेरा भाव यही है कि सौ साल बाद क्या, ये अब आगे ना रहें यहाँ। ये मूल में जाएँ। ये अभी कर रहे हैं, सौ साल बाद भी यही करेंगे। आखिरी कब आएगा। जब ये करना छोड़ेंगे तब। आखिरी कब आएगा। जब आप चाहोगे, तब आखिरी है। परिवर्तनशील का आखिरी कहाँ। जिसका दायरा होगा, उसका आखिरी है। परिवर्तनशील का आखिरी कहाँ है। आपकी आँख बंद करने से दुनिया खत्म नहीं होती। सपने की स्थिति वो है जो वास्तविक नहीं है। जब सपना प्रत्यक्ष हो रहा होता है, तो लगता है कि सही है। और जब खत्म हो जाता है, तो पता लगता है कि जो चीज थी वो वास्तविक नहीं थी। जब जागोगे तब बोल सकते हो। अभी तो नहीं बोल सकते। सपने से उठोगे तब, जागोगे तब। सपना टूटने के बाद बोल सकते हैं कि सपने में थे। अभी आप एक सपने का आधार लेकर बोल रहे हो कि सपने में हूँ। सपने में हो तो जाग जाओ। जाग क्यों नहीं रहे। सपने का आधार लेकर आप बोल रहे हो, मैं सपने में हूँ। अगर वो सपना नहीं होता, तो आप इसे सपना नहीं कहते। आप अपने आप को समझाने के लिए कर रहे हो। सपना है तो फिर छोड़ दो, सब छोड़ दो। छोड़ नहीं पा रहे हो। इसका मतलब सपना अभी नहीं है। ये बोलने में ठीक लगता है, क्योंकि एक सपने का आधार लिए हो। अगर उस सपने को हटा दिया जाए, तो फिर क्या एक सपना है। जागने के बाद बोल सकते हैं, सपना है। जब तक नहीं जागे, आप कैसे बोलोगे। समझ कर सपना बोल रहे हो। सपना नहीं है। सपना होता तो छोड़ देते। जी तो रहे हो उसी में। सपना है तो क्यों जी रहे हो। जाग जाओ। हकीकत ही है। जागने के बाद बोलेंगे, सपना है। अभी हकीकत ही है। एक घंटे पहले जो हुआ, वो आपका एक सफर था, यात्रा थी। खत्म नहीं हुई। पर है नहीं। आप आगे बढ़ गए हो। वो पीछे है अभी। उसका उपयोग कोई और कर रहा है। मैं तो वहाँ नहीं हूँ। जो चीजें बनाईं, वो भी वैसे नहीं रहीं, वो भी बदल रही हैं। सब कुछ बदल रहा है। सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है। बस आप नहीं बदल रहे। हर देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आप कहते हो, मैं नासमझी में भी था, समझ में भी था। आपकी समझ घट रही है, बढ़ रही है, लेकिन आप वही के वही हो। अगर देखा जाए तो आप स्थिर हो। आप ना कहीं आए, ना कहीं गए। ना कुछ बोले, ना कुछ सुने। जरूरत में ये सब किया। आपने कुछ नहीं किया। ये मैं आखिरी बात आपको बता रहा हूँ। सफर भी आपका नहीं रहा। जरूरत का रहा। आप सफर में भी आप थे। सफर नहीं में भी आप हो। सफर खत्म हो गया तो भी आप हो। सफर में रुक गए तो भी आप हो। हर जगह आप ही आप हो। बस आप वैसे के वैसे हो। ज्यों के त्यों बने हो। आपमें एक प्रतिशत भी बदलाव नहीं हुआ। आपने कहा, मेरे पास समझ कम थी, तो भी आप थे। अब कहो, मेरी समझ बढ़ गई है, तो भी आप थे। समझ बढ़ी क्या। लेकिन आप वही के वही हो। आप ही समझा रहे हो। ये आखिरी है। ना कोई कहीं गया, ना आया। आप ज्यों के त्यों बने हो। ये आखिरी स्थिति के बाद की बात है। अभी नहीं। अभी तो छुड़ाना है। और छुड़ाने के लिए ईमानदारी के पैसे से मन को करवा दो, और छूट जाओ। समझ कर जी लो। किसी को तकलीफ ना दो। बस, बात खत्म।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18