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प्रश्नोत्तर P5-0072 · भाग 5

मैं का मैं से मिलन होने पर लक्षण/अनुभूति कैसे बताएं? बाहर तो माया है।

एक समझ होती है। अब मैं कैसे व्यक्त करूं। कैसे वह स्थिति बताऊं। खुशी बताऊं, खुशी व्यक्त करूं। वह कुछ ऐसा है जैसे गूंगा गुड़ का स्वाद कैसे बताए। जैसे कोई पहुंच गया, बस शांत, लंबी सांस, यहां लक्ष्य पहुंच गया, बस आराम से बैठेंगे, पहुंच गए। अब जैसे एक व्यक्ति हो, और उससे पूछ रहे हो। उसके साथ दोनों घटना हुई है, शादी की भी, और उसके साथी की मौत की भी। बोले, मुझे व्यक्त करो। तो क्या व्यक्त करे। एक काम कर, तू शादी कर, और जब साथी मरे, तब वह अनुभूति करना। अब जिसका मरा ही नहीं, जिसने किया ही नहीं, उसे मैं कितना भी बताऊं कि मुझे यह हुआ, यह दुख था और यह सुख था। शादी में तो पहले सुख आता है, बाद में दुख आता है। लेकिन गड़बड़ साथी मिल गया तो पहले दुख आया, और मर गया तो सुख आया। अब आपके साथ अगर वह घटना नहीं घटी, और आप पूछ रहे हो, तो आप न उसके सुख में सम्मिलित हो पाओगे, न उसके दुख में सम्मिलित हो पाओगे, क्योंकि घटना आपके साथ नहीं घटी। तो आपको क्या बताएं। आप उसमें लीन नहीं हो पाओगे। घायल की गति घायल जाने। मीराबाई ने कहा, घायल की गति घायल जाने। जो गति घायल की है, वह मैं कैसे बताऊं, क्योंकि आप उसमें लीन नहीं हो पाए। अगर मैं किसी भाषा में आपको बता रहा हूं, और भाषा आपको नहीं आती, तो मैं कहानी सुना के क्या मतलब है। कहानी सुनाने का मजा तब है जब उस कहानी में आप लीन हो पाओ। आप लीन तभी हो पाओगे जब आपके साथ घटना घटी हो। घटना नहीं घटी है तो आप बस सुनोगे, और हम पागल की तरह बोलेंगे। हमें भी सुनाने में रस नहीं आएगा, तुम्हें भी नहीं आएगा। तुम ही किसी को सुनाओ और वह समझ नहीं पाए, नहीं आएगा। आपके साथ घटित होगा, तभी आपसे बात करने में मजा आएगा। जैसे अष्टावक्र राजा जनक से खूब बात करते थे, अन्य शिष्यों को भी छोड़ देते थे। तो घटना को तब व्यक्त किया जाए जब तेरे साथ भी हो जाए। तब दोनों मिलके बात कर सकते हैं। फिर तो बात करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि हो ही गया। फिर तो गूंगा और गुड़ दोनों आपस में समझ लेंगे। एक बार यह प्रसंग आया कि महात्मा बुद्ध और महावीर एक ही समय हुए। बहुत बार ऐसा होता था कि वे एक ही धर्मशाला में होते थे, अलग अलग कमरों में। तो उनके शिष्य बोलते थे कि आप लोग मिलते क्यों नहीं, बात नहीं करते। तो कहें, क्या करेंगे। हमारे पास कोई बात ही नहीं है। हम दोनों बैठेंगे तो निशब्द ही हैं। कोई बात ही नहीं है। यह बात भी तुम्हारे लिए करनी पड़ रही है। टकराव तो तब होगा जब दोनों विपरीत होंगे। दोनों एक जैसे होंगे तो क्या बात करें। आप लोगों का गणित कुछ और है, लेकिन यह आध्यात्मिक गणित कुछ और है। वहां प्लस और माइनस मिलता है तो कुछ होता है। लेकिन यहां माइनस और माइनस मिलेगा तो कुछ नहीं होगा। प्लस और प्लस मिलेगा तो कुछ नहीं होगा। मतलब एक जैसे मिलेंगे तो क्या बात करें। बात तो तब होती है जब दोनों अलग हों। लेकिन यह गणित फाइनल है। प्राकृतिक गणित यह है कि नर और नर मिलेंगे, मादा और मादा मिल गई, तो कुछ नहीं होगा, तीसरा पैदा नहीं होगा। लेकिन नर और मादा मिलेगा तो पैदा होगा। एक जैसे मिलेंगे तो कुछ नहीं होगा। जब अलग मिलेगा, तभी कुछ पैदा होगा। दो एक जैसे मिले तो क्या पैदा होगा। दोनों एक जैसे हैं तो कुछ पैदा होगा क्या। चाहे अज्ञानी हों, चाहे ज्ञानी हों। दोनों अगर एक जैसे हैं तो कुछ पैदा नहीं होगा। जैसे नारद और रत्नाकर दोनों विपरीत थे। अगर एक जैसे होते, वह भी डाकू होता और यह भी डाकू होता, तो दोनों ही तलवार लेकर लूटते, एक जगह एक दूसरे को मारते। कुछ पैदा नहीं होता। कुछ नया नहीं होता। कुछ नया तभी होता है, नए का जन्म तभी होता है, जब दोनों अलग अलग हों। यहां तो फिर एक पहुंचा हुआ होना चाहिए, और एक जिज्ञासु होना चाहिए। दोनों पहुंचे हैं तो कोई बात नहीं। और दोनों नहीं पहुंचे हैं तो भी कोई बात नहीं। बात तो तब होगी। नया कुछ घटित तब होगा जब एक पहुंचना चाह रहा होगा, और एक पहुंच गया होगा। एक पहुंचने की जिज्ञासा वाला, और एक पहुंच चुका होगा।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09