प्रश्नोत्तर P5-0093 · भाग 5
साधक के लिए सबसे जरूरी बात क्या है? अपनों की कुटिया में रहने के नियम क्या हैं?
साधक को ध्यान रखने वाली योग्य बात यह है। जब वह साधना कर रहा है, इसका विशेष ध्यान रखे कि साधक का मतलब है मैं कुछ सीखने जा रहा हूं। और सीखना इसलिए चाहता हूं कि मैं सुधरना चाहता हूं, अपने आप को बदलना चाहता हूं। बदलाव के लिए मैं साधना करने जा रहा हूं। अगर मैं सीखने जा रहा हूं तो मेरे सामने कोई है, और उस व्यक्ति ने कोई नियम बनाए हैं। उस नियम और अनुशासन में जब आप पूरी तरह जिएंगे, तब आप सीख पाएंगे। पहले जाकर वहां के नियम को समझिए।
आपकी गलती क्या है। आज के साधकों की हालत यह है कि पहले वे व्यवस्था को चेक करते हैं। नियम से तो उन्हें कोई मतलब ही नहीं। वे लेट्रिन चेक करेंगे, शौचालय चेक करेंगे, व्यवस्था चेक करेंगे, लेकिन नियम चेक नहीं करेंगे कि मैं कुछ सीखने आया हूं, इस सीखने में क्या-क्या नियम का पालन करना होगा। उनसे यह मतलब नहीं है। उन्हें बस व्यवस्था से मतलब है। व्यवस्था मिल जाए, और उन्हें कोई भी नियम अगर बताओ तो नियम जी नहीं पाते। तो साधना आपकी कैसे होगी? जब आप अनुशासन में ही नहीं जिएंगे, नियम का पालन ही नहीं करेंगे, साधना कैसे होगी आपकी? और जब आप ही उस लायक थे, तो साधना करने जाने की क्या जरूरत थी? उस जगह पर क्यों गए? क्योंकि आपकी वजह से बहुत लोग परेशान हो रहे हैं। अगर आप कहीं जाते हो और वहां के नियम का पालन नहीं करते हो, तो सामने वाला व्यक्ति आपको देखे, अपने आप को देखे, या काम को देखे, क्या करे वह? फिर क्या होता है, उस जगह की व्यवस्था बिगड़ जाती है आपकी वजह से। और फिर आप कहते हो पाखंड हो रहा है। पाखंड के जिम्मेदार आप हो।
क्या आप पाखंड कर रहे हो, यह नहीं दिख रहा है। जब आप नियम तोड़ रहे हो, यह पाखंड नहीं? जब आप नियम तोड़ रहे हो तो आपको यह अपना पाखंड नहीं दिखता। आप कहते हो, कहीं पर जाकर आज लोगों की शिकायत ही है कि पाखंड हो रहा है। अरे, पाखंड जरा अपना देख लो। जब आप कहीं जाकर नियम तोड़ते हो तो आप पाखंड नहीं कर रहे हो? वह पाखंड आपको नहीं दिखता। और आप कह रहे हो मेरा कुछ हो नहीं रहा है। कुछ नहीं होगा। अगर आप इस तरह से जीते रहे तो आपका कुछ होने वाला नहीं है।
पहले आप कहीं जा रहे हो तो वहां का सर्वप्रथम काम है, नियम को पूरी तरह पूछ लेना। यहां मैं रहना चाहता हूं, यहां साधना करना चाहता हूं, मैंने साधक के जीवन का चुनाव किया है, यहां का नियम बताइए। मैं उस नियम में देख लूं। अगर मैं उस नियम को पूरी तरह स्वीकार कर लूं, मेरे लायक रहेगा, तो रहूंगा, नहीं तो मैं निकल जाऊंगा। लेकिन क्या आज तक आपने ऐसा किया? नहीं। जाते ही लेट्रिन कहां है, बाथरूम कहां है, यहां भोजन की क्या व्यवस्था है, गर्म पानी है कि नहीं है, यह जरूर चेक करते हो। आज तक आपने यही चेक किया, और इसीलिए आपको आज तक यही मिला। जिसके लिए गए हो, वह मिलता नहीं। क्यों नहीं मिलता, पता है? इसीलिए, क्योंकि आप उसके लिए गए ही नहीं हो। मूल के लिए नहीं, आप तो गए हो व्यवस्थाओं के लिए। व्यवस्थाओं को देखते हो। हलवा अच्छा था, पूरी अच्छी थी, वहां की मिठाई अच्छी थी, पंचमेवा बढ़िया था, पनीर बढ़िया था, काजू बादाम बढ़िया था। बस यही होता है। वहां की लड्डू अच्छी थी, देसी घी की लड्डू थी। आपके पास जाते हो तो यही सब बातें घर पर करते हो। वहां का भोजन बड़ा बढ़िया था, लड्डू बहुत बढ़िया था, वहां का काढ़ा बहुत बढ़िया था। क्या बताऊं, इतनी दूर से काढ़ा पीने आए। सोचने वाली बात है, आप अटके कहां हो। ईमानदारी से अपने आप को पूछिए। पहला आपका प्रश्न क्या रहता है, वहां व्यवस्था क्या है।
एक आदमी वहां जी रहा है। क्या वह बिना व्यवस्था के जी रहा है? एक व्यक्ति अगर वहां रह रहा है तो बिना व्यवस्था के रह रहा है क्या? फिर भी आप व्यवस्था पूछ रहे हो। तो कहीं भी जाइए, साधक को ध्यान रखना चाहिए। पहले जाके, अगर आपको साधना करनी है, जहां पर रहना है, ईमानदारी से पहले वहां का नियम पूछो। और जब पूरी तरह नियम को स्वीकार करो, तो उस नियम में जियो, नहीं तो वहां की ऊर्जा नहीं मिलेगी आपको। आप ऊर्जा से वंचित रह जाओगे। आप यह मत समझ लो कि सामने वाले व्यक्ति को मैं चोरी से गया, बात कर ली, यह कर लिया, और उसने देखा नहीं। देखने वाला देख रहा है। यही तो आपकी भूल है। आप वही गलती संसार वाली वहां भी कर रहे हो। तुम्हें लगता है देखने वाला यह शरीर है। यही गलती है। देखने वाला यह शरीर नहीं है। यह शरीर बस निमित्त है। देख रहा है जिसे देना है, वह देख रहा है। आप सोच रहे हो वह बेवकूफ है। आप जहां पर खड़े हो, वहां से वह बेवकूफ ही है, कि आप अपने लिए नियम का पालन नहीं कर सकते और वह आपके लिए नियम का पालन कर रहा है। इसी बेवकूफी की वजह से वह उस स्थिति में पहुंच गया, और इसी तुम्हारी चालाकी की वजह से तुम रगड़े जा रहे हो। यह चालाकी रही तो ऐसे ही रगड़े जाओगे। यह ध्यान रखना।
हमारे मुंह से पहली बार यही निकलता है, क्या वहां व्यवस्था है, क्या हम आना चाहते हैं। एक व्यक्ति वहां रह रहा है, जीवित। ऐसा भी नहीं कि उसका पुतला बना है। क्या व्यवस्था वहां है, लेट्रिन है, बाथरूम है। इतने हजार किलोमीटर से लेट्रिन करने मध्य प्रदेश में आ रहे हो। जरा सोचो, वह व्यक्ति रह रहा है, आपको यह सब पूछने की क्या जरूरत है। आप किसके लिए आ रहे हो, ज्ञान के लिए या व्यवस्था के लिए? और एक आदमी अगर जीवित रह रहा है तो आप भी तो इतना तो मिलेगा जितने में आप जीवित रह सको। फिर आपको यह सब पूछने की क्या जरूरत है? आप सोचिए जरा इस बात को। मैं आप लोगों को सचेत कर रहा हूं कि आप समय बर्बाद मत करिए। आप लोगों को पाखंडी कहते हो, आपका पाखंड आपको नहीं दिखता। साफ-साफ करते हो, और आपको दिख ही नहीं रहा कि मैं भी पाखंडी हूं। आप कभी नहीं देख पा रहे हो। मैं यही देख रहा हूं। आजकल के साधक बस व्यवस्था पूछते हैं। सर्वप्रथम लिस्ट निकाल दो, भोजन का और बाथरूम का और बिस्तर का। और इससे आपको निकलना पड़ेगा। अगर आप साधक हो तो आपको इससे निकलना पड़ेगा। साधक कभी व्यवस्था नहीं देखता। साधक ज्ञान देखता है, कि मैं जिस लिए जा रहा हूं मेरा काम होगा कि नहीं। क्योंकि एक व्यक्ति जीवित है तो मैं भी तो रह लूंगा। वह पुतला नहीं है जिसके पास मैं जा रहा हूं, कि पत्थर का, मिट्टी का उसका पुतला बनाया गया है। तब पूछते तो बात अलग थी। जीवंत आदमी आपको बुला रहा है, पुकार रहा है, आओ, और आपके प्रश्नों के उत्तर देंगे। तो आप प्रश्नों के उत्तर के लिए आए हो कि व्यवस्था के लिए? वह भी तो रह रहा है, तो आपको रखेगा, आपको व्यवस्था देगा। लेकिन आप गए हो, वहां पूरा नियम सुनने के बाद भी नियम तोड़ रहे हो, मजाक कर रहे हो। नियम सुन लिए, उसके बाद भी उसे बोलना पड़ रहा है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो। मतलब आपको मजाक लग रहा है। एक व्यक्ति का जीवन लग जा रहा है और आपको हंसी आ रही है। आप मजाक करने के लिए आए हो। इसे बहुत गहराई से समझिए।
अगर आप अपने परिवार से भी कहोगे, मुझे चौबीस घंटे समय दो, तो मुझे नहीं लगता एक-दो दिन कोई दे पाएगा। ऊब जाएगा तुमसे। आप अपने परिवार में जिसे भी आपको लग रहा है कि बहुत प्यार करता है, आप बोल दो कि बस ज्यादा नहीं, मेरे पास लगातार एक-दो महीने रहो, मुझे छोड़ के मत जाना। रह के देख लो। आप इन सब बातों को समझिए। आप समय बर्बाद मत करिए। मैं आप लोगों को भी बोल रहा हूं, आने वाले लोगों को बोल रहा हूं। अगर आप नियम का पालन नहीं कर सकते, अनुशासन में नहीं जी सकते, और यहां का नियम बता दिया, तो कृपया करके यहां मत आओ। क्योंकि मेरा भाव यह नहीं कि भीड़ हो। मेरा भाव बस इतना है कि आप लोग साधना करके आपका आत्मिक स्तर उठे। पर परिवार बस आपका नहीं है, इस व्यक्ति का भी है। इस बालक के मोबाइल पर मेरे घर से भी फोन आ चुका है, लेकिन आज तक मैंने यहां से बात नहीं की। ऐसा नहीं कि बस आप ही को चाहने वाले दुनिया में हैं। सात महीने के ऊपर हो गया। इसके नंबर उन लोगों को मिल गया, तो लोगों ने इस पर संपर्क किया कि मेरी बात कराओ। तो हमने मना कर दिया। हमने कहा छोड़ो, जाने दो, मेरे लिए काम अभी बहुत जरूरी है। आपको लगता है मेरा ही घर है, मेरे ही लोग हैं, और कोई लावारिस है। आपको यह सब बातें समझना चाहिए।
मैंने यही देखा कि अगर कुछ गड़बड़ी हो रही है, उसकी जिद हम लोग खुद हैं। साधक का जीवन उतनी व्यवस्था में होना चाहिए जितने में वह जी सके। और व्यवस्था तो उसे पूछना ही नहीं चाहिए। वह व्यक्ति रह रहा है, व्यवस्था आपको देगा। अगर वह जी रहा है तो आपको भी जीने का तो देगा, इतना तो देगा ही। मूल पर बातें करो। सात महीने के ऊपर हो गए, कभी मैंने फोन हाथ में भी नहीं लिया। अगर मैंने किसी से बात की है तो काम को लेकर बात की है। अभी तक मेरे घर से फोन आया, लेकिन हमने बात नहीं की, क्योंकि मेरे लिए काम जरूरी है। मैं काम कर रहा हूं। हां, कोई अगर खत्म हो गया तो बात अलग है। आईसीयू में गया तो बात अलग है, तब बात करनी पड़ेगी। और अगर आपको इतनी इमरजेंसी है तो नंबर तो दिया गया है। आपके लिए यह व्यवस्था है। इससे क्या होता है, एक आदमी आपकी रखवाली करे कि अपना काम करे? आप बात करो उधर, वह चुप रहे। आप बात मत करो। सुबह हमने कितनी बार आवाज मारी। एक दिन कह दिया गया कि यहां पर आपस में बात करना मना है। अगर आप नहीं रह सकते तो मत रहो। रोक कौन रहा है? मैं लाइव में इसलिए बोल रहा हूं कि अगर ऐसे लोग हैं तो मत आएं। अगर साधक हो तो आओ। यह साधक के लिए मैं इतना समय दे रहा हूं। यह व्यवस्था साधक के लिए है, और किसी के लिए नहीं है। आप समझिए, यह टाइमपास वालों के लिए एकदम व्यवस्था नहीं है। कृपया ना आएं। समय बर्बाद करने वाले ना आएं। और अगर यहां के नियम का पूरी तरह पालन कर सको, तब आओ, नहीं तो मत आओ। मुझे भीड़ नहीं बढ़ानी है। यह दिखाना नहीं है कि देखो कितने साधक साधना कर रहे हैं। आप इस बात को पूरी तरह समझ लीजिए। आप अगर यहां रहिए तो चाहे एक दिन रहो, लेकिन एक दिन पूरी तरह सधकर रहो, नहीं तो मत रहो। क्यों रह रहे हो? मैं नहीं चाहता कि यहां से जाने के बाद कोई कहे कुछ नहीं हुआ। यहां आए हो तो होना चाहिए। यहां से जाओ तो कुछ सीख के जाओ। आपके जीवन में बदलाव आना चाहिए, नहीं तो कोई मतलब नहीं होगा।
क्या आपके यहां लेट्रिन, बाथरूम नहीं था? क्या आपके यहां भोजन नहीं है? क्या कोई कमी है? आप क्यों समय बर्बाद कर रहे हो? जब आप इतना कीमती समय निकाल रहे हो, तो कह दिया गया मोबाइल बंद, तो बंद, बात खत्म। अब एक आदमी आपकी रखवाली करे, कौन बात कर रहा है, कौन नहीं कर रहा। यही आपने साधक के जीवन का चुनाव किया, आपको नियम बता दिया, देखभाल करे क्या? इसे समझिए। आप लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हो। हमें कितनी बार बोला, व्यावहारिक बातें करना मना है। कोई देखता हूं वहां बात करे। एक आदमी क्या करे, आपके पीछे पड़े? यह कोई बात होती है? आप लोग मजाक कर रहे हो। हमें सात महीने के ऊपर हो गए, और आज तक मैंने कभी अपने घर वालों से बात तक नहीं की। फोन भी आया तो भी नहीं किया। मैं एक व्यक्ति आपको पूरा समय दे रहा हूं और आप मजाक कर रहे हो। कोई नियम बनता है तो ऐसे ही नहीं बनता है। उसके पीछे जीवन लग गया है एक व्यक्ति का। आप उस नियम में रहकर देखो। पहले अगर वह नियम बनाया है, उसके पीछे कुछ रहस्य है। जब आप उसमें जियोगे तब समझ में आएगा। वह व्यक्ति कितना आपके पीछे पड़ेगा? अब हम यही देखें क्या, कौन कहां बैठा है, किससे बात कर रहा है? एक बार आपको समझा दिया गया और आपने स्वीकार कर लिया तो बात खत्म हो गई। कहीं भी जाते हो साधना करने, वहां के नियम को पहले समझ लीजिए। अगर आपको लगता है कि मैं अपना पाऊंगा तो रहो, नहीं तो नर्मदे हर बोलकर चलो अपने घर, कि मुझसे नहीं होगा।
इसका विशेष ध्यान दो। कहीं भी जा रहे हो, पहले तो वहां नियम पूछिए। व्यवस्था बाद में पूछना। व्यवस्था पूछने की जरूरत नहीं है। अगर एक व्यक्ति जीवित रह रहा है तो इतना तो देगा, इतना तो व्यवस्था करेगा। इतनी तो उसमें मानवता है, इतना तो व्यवस्था देगा जिसमें आप जी सको। अगर उसने आपको बुलाया है, बोला है आओ, हम यहां पर हैं, और साधक के लिए भोजन और रहने की निशुल्क व्यवस्था है, तो जरूर वह कुछ समझ के ही बोल रहा है। ऐसे ही नहीं बोल रहा है। तो आपकी व्यवस्था की है। व्यवस्था तो आपको पूछना ही नहीं चाहिए। आप अपने मेहमान के घर मेहमान बनकर गए और बोलोगे क्या-क्या बनाओगे? कोई बात होती है यह? यही संस्कार आपने सीखे। जब से पैदा हुए, मतलब आप किसी मेहमान के यहां गए और पूछ रहे हो कि अच्छा, भोजन में मुझे क्या-क्या बनाओगे। जरा सोचो इस बात को। आपके यहां अगर मेहमान आ जाए, और उन्होंने कहा कि भोजन में क्या-क्या बनाओगे, आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा। फिर आप सोचिए, तो आप क्या करते हो। और हर जगह के नियम होते हैं। आपके मेहमान आए, सीधा बेडरूम में चला जाए, तो अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए मर्यादा में जीना सीखो। पहले जीना तो सीखो, मर्यादा में। समय बर्बाद मत करिए। मैं आप लोगों को इसलिए बता रहा हूं, लाइव में भी लोगों को बता रहा हूं। दुनिया में कहीं भी साधना करने जाओ, वहां के नियम में जियो, तब आपको कुछ समझ में आएगा। और नहीं जी सकते तो मत जाओ। जरूरत क्या है? कोई जबरदस्ती आपको पकड़ के तो नहीं ले जा रहा है। आप मत जाइए। अगर आप नहीं जी सकते तो मत जाइए।
इससे क्या होता है। एक आदमी की गड़बड़ी से पूरा माहौल खराब हो जाता है। जैसे कहावत है, एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। एक सड़ी निकल जाए तो पूरे तालाब की तरफ बास मारता है। जब तक वह एक नहीं निकलेगी, मतलब जितनी अच्छी है उसका प्रभाव खत्म। एक सड़ी निकल गई, पूरा तालाब बास मारने लगता है, जब तक वह निकले नहीं। एक आदमी अगर इधर-उधर किया, पूरी व्यवस्था को बिगाड़ देगा। पूरा व्यवस्था डगमगा जाता है। दूसरा आदमी देखता है और वह बड़े आसानी से कहता है कि मैं तो जा रहा हूं। लेकिन तुमने कितना व्यवस्था को बिगाड़ दिया, यह आपने नहीं देखा। जाते-जाते आपने क्या छोड़ के जा रहे हो, पहले वह तो देखो। जहां कहीं जाओ तो अपनी छाप छोड़ के जाओ। कहीं जाओ तो अपनी छाप छोड़ के जाओ, कि मैं उस नियम में पूरी तरह जिया। आपको लगना चाहिए कि मैं गया था, इतने दिन साधक बनकर रहा, और मैंने पूरी तरह वहां के नियम का पालन किया। एकदम सीना ठोक के कह सको। और आप कह रहे हो कुछ नहीं हुआ। आप खुद नियम का पालन नहीं किए तो होगा कैसे? जब आपने खुद नियम को तोड़ दिया तो होगा कैसे? अब आप सामने वाले का दोष दोगे, लेकिन आपका दोष नहीं दिख रहा, कि आपने नियम को तोड़ ही दिया। होगा कैसे? उसमें सामने वाला क्या करे? तुमने भोजन के पहले फिटकरी घोल के पी ली और कह रहे हो भोजन में स्वाद नहीं आ रहा है, तो सामने वाला क्या करे? घंटों से भोजन बनाया होता है। फिटकरी का पानी कुल्ला कर लो, फिर भोजन करो, स्वाद ही नहीं मिलता। तो आपकी हालत यह है। अब कह रहे हो तुमने भोजन कैसा बनाया। भोजन बड़ा बढ़िया है, लेकिन तुम फिटकरी का पानी कुल्ला कर रहे हो। गया था, कुछ हुआ नहीं। अरे, आप उस नियम में जियो। उस नियम को जब तुमने तोड़ ही दिया तो होगा क्या?
हम आते ही बता देते हैं। भाई, ध्यान से समझो। यहां बारह के बाद का नाश्ता है, शाम को भोजन है। व्यावहारिक बातें करना नहीं है। मोबाइल चुप है, नंबर यह है, इमरजेंसी के लिए। वह भी कोई आईसीयू में हो, या कोई निकल गया, तब फोन करेंगे। आप जितना दिन चाहो, एक दिन से लेकर आजीवन रह सकते हो। और यहां पर बातचीत ना करना। सत्संग होगा तो सत्संग में बैठना, जब तक सत्संग हो। और अगर कोई वृद्ध है तो उसे दो टाइम भी भोजन दिया जाएगा। अगर कोई बीमार है तो उसको भी दो टाइम, तीन टाइम भोजन दिया जाएगा। यह जब बोल दिया गया, और जब इतना बोल दिया गया, तो अब बोलने के लिए बचा क्या? और आपने कहा हां। लेकिन वह सुबह उठा तो कह रहा है बातचीत मत करो। अब एक ही काम रहे, कि आपकी रखवाली करें। अब इतनी दूर से आकर किसी को अपनी रखवाली में लगा दिए, और वह आपकी रखवाली करे, कौन कहां बात कर रहा है। या तो सीधा बोल दे कि नर्मदे हर, तुरंत बैग लो, निकल लो। या तो यह बोले आपसे कि आपने नियम तोड़ा, आप तुरंत जाओ। या तो क्या करेगा वह? बोलना पड़ेगा उसे सुबह-शाम यही। या वह सीधा एक ही बात कहेगा, भाई साहब, हाथ जोड़ता हूं, बस निकल लो। और मैं इतना जरूर कह देता, लेकिन मुझे मालूम है कुछ न कुछ तुम सीख रहे हो यहां, इसलिए मैं यह कह नहीं पा रहा हूं। लेकिन मुझे कहना पड़ेगा। आने वाले समय में मैं बोल देने वाला हूं कि भाई साहब, बस अब जाइए, हो गया, साधक जाइए, और कहीं साधना करिए। आपके पास कोई कमी नहीं है। आप आराम से घर पर रहकर साधना करो। वही बात करो अपने परिवार से, और वही साधना करो। जब परिवार की इतनी चिंता थी तो साधक की जिंदगी का चुनाव क्यों किया? वहीं रहते, अपने घर पर आराम से, वही कमरे में साधना करते। इस पर कोई संशय हो, कोई प्रश्न हो, तो आप लोग निःसंकोच बोल सकते हो।
जब आपको समझा दिया गया तो क्या यह कर रहे हो? आपकी तो कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। हमारे गुरुदेव हमारे लिए इतना कुछ कर रहे हैं। आपने देखा, किसी से मैं पर्सनल बात किया? आज क्या आपको नहीं लगता, हमारे चाहने वाले भी हजारों में होंगे? हम तो कुछ भी नहीं। ऐसा नहीं है। लेकिन जब कुछ करना है तो त्याग करके बैठना पड़ता है। ऐसे ही नहीं होता। क्या हमारे मिलने-जुलने वाले जिंदगी में नहीं होंगे? हजारों होंगे। लेकिन मुझे काम करना है। मेरे लिए सबसे प्रिय काम यह है। इसलिए मैं आप लोगों को भी बोल देता हूं, अब मुझे बोलना न पड़े। और लाइव में आने वालों के लिए बोलता हूं। अगर आप इतना नियम का पालन कर सकते हो, तब आकर यहां पर साधना करो। और नहीं तो फिर आने की जरूरत नहीं है। कोई मतलब नहीं। आकर टाइमपास, आपका भी समय बर्बाद होगा, मेरा भी समय बर्बाद होगा, क्योंकि मुझे भी समय देना पड़ता है। नहीं तो मैं अपने आप में पढ़ा रहूंगा। आप लोग तो बैठते हो, हम तो दिन भर बोलते रहते हैं। क्या हमारा शरीर नहीं थकता होगा? आपका सुनने में थक जाता है। एक व्यक्ति सुबह से लेकर रात तक बोल रहा है, किसके लिए? आपके लिए बोल रहा है। क्यों? क्योंकि आप में बदलाव आ जाए। और कोई बात है क्या? तो समझना चाहिए। मैं इसलिए बोल रहा हूं कि आने वाले साधक भी सचेत हो जाएं, आप लोग भी सचेत हो जाइए। और नहीं तो मुझे सीधा कहना पड़ेगा, बस हो गया। यह देखो रास्ता है। जिस रास्ते से आए हो, उसी से निकल लो। क्योंकि जाना वही है आपको। रास्ता तो वही घुमा-फिरा के होगा। वे लोग भी आपका इंतजार कर रहे हैं। क्या जरूरत है फोन से बात करने की? जाके प्रत्यक्ष मिलो उनसे। फोन से बात करने की क्या जरूरत है? जाकर प्रत्यक्ष मिलो उनसे, प्रत्यक्ष बातचीत करो। यह सब बातों को समझना चाहिए।
कहीं आप गए हो तो अपनी छाप छोड़ के जाओ, कि सच में आप वहां पर रहे, और आप अपने आप से कह सको, सीना ठोक के, कि मैं पूरी तरह वहां के नियम का पालन किया, पूरी तरह मैंने अनुशासन में जिया। यह आप अपने आप से कह सको। नहीं होगा तो सुबह आने वाली है, निकल लेना ही। नहीं तो निकल लेना। मैं अभी कह रहा हूं, जब इतने दिन से नहीं सुधर सका। अभी यहां पर इतने दिन हो गए, मेरा भी दस दिन हो गया। अभी इतनी कोशिश कर रहे हैं, फिर भी कुछ माया घेर जा रही है। वही, जब बहुत अपने आप को कंट्रोल करके, कोशिश करके संभाल रहे हैं। एक रास्ता तो है जाने का। यह तो स्वतंत्रता है। मैं खुल के कहता हूं आप लोगों से। हमने तो आपको बांध के नहीं रखा है। यहां कोई गुरु दीक्षा भी नहीं दी, कि क्या होगा, हमने इनको गुरु बना लिया। ऐसी भी कोई बात नहीं। यह भी डरने की जरूरत नहीं है आपको। हमने आपको दीक्षा भी ऐसा नहीं दी कि बंधन हो गया, कि हमने तो इनको गुरु बना लिया, गुरु के विरोध में सोचना पाप है। यह पाप है न, पुण्य है। मुझे जाकर गाली भी दोगे तो कोई फर्क आपको नहीं पड़ने वाला। आपको आशीष ही मिलेगा हमारे तरफ से। आप हमें गाली भी दोगे तो भी मेरा काम बस एक ही है, आपको आशीर्वाद देना। और मेरे पास कोई काम नहीं, और मेरे पास इसके अलावा जिंदगी में कुछ बचा भी नहीं।
हमारी स्थिति इसके जैसी हो रही है। बार-बार मार-मार के लाना पड़ता है जगह पर। आपको इसके जैसी हो रही है, क्योंकि ऐसी अव्यवस्थाओं से आते हैं हम यहां। यहां व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगता है। आपको कुछ सोचना ही नहीं है।
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वीडियो: अपनों की कुटिया में रहने के नियम साधक के लिए सबसे जरूरी बात क्या है ? · 2024-12-31