आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P6-0043 · भाग 6

समझ बढ़ाने की बात हुई, पर समझ अपने हाथ में है ही नहीं। हाथ में होती तो कब का विकसित कर लिया होता। जिज्ञासा भी भीतर से अपने आप उपजती है, विचार अपने आप उठता है, और किसी समय कोई विचार आता ही नहीं। फिर तो चाहत हो गई, और चाहतों में फंस जाएंगे। एक संकल्प छोड़ने के लिए क्या करना है?

समझ आपके हाथ में कैसे आती है? जब जिज्ञासा रखोगे तब कोई निमित्त बनेगा। जिज्ञासा ही नहीं रखोगे तो निमित्त बनकर भी वह क्या करेगा। एक अवस्था यह है कि जैसा आपको चाहिए, वैसा विचार आएगा। फिर तो चाहतों में फंसे रह जाओगे। अब क्या करना है? एक संकल्प छोड़ने के लिए दूसरा संकल्प बनाना पड़ेगा। जैसे एक कदम छोड़ने के लिए दूसरा कदम कहां रखूंगा, यह देखना पड़ता है। जगह नहीं है तो पहला कदम हटेगा नहीं। डर है, फिसल जाएगा। जिंदगी दांव पर थोड़ी लगानी है। पहला कदम जहां रखा है, वहां से हटाने के लिए कहीं रखने की जगह चाहिए, आधार चाहिए, क्योंकि वह आधार पर टिका है। एक संकल्प तोड़ने के लिए दूसरा संकल्प बनाना पड़ेगा, नहीं तो संकल्प टूटेगा नहीं। मुझे निर्विकार का संकल्प बनाना पड़ेगा। ऐसा संकल्प जो उस पुराने संकल्प को तोड़ भी दे और खुद बनकर फंसाए नहीं। एक ही संकल्प है, एक ही धारणा। धारणा, ध्यान, समाधि, तुम ब्रह्म। एक ही संकल्प बनाना है कि मुझे निर्विकार होना है। निर्विकार क्या है? राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता के भाव से छुटकारा। यह संकल्प वहां से हटा भी देगा और खुद खत्म भी हो जाएगा। संकल्प बनाना पड़ेगा। संकल्प बनाओगे तो ऐसे लोग मिलने लगेंगे। यह प्रकृति कल्पवृक्ष है। जैसा संकल्प, वैसे लोग मिलते हैं। संकल्प नहीं है तो मिल भी जाए तो क्या करोगे। प्यास नहीं लगी और सामने नदी बह रही है, तो क्या फर्क पड़ता है। प्यास लगी हो तो नदी नहीं, समुद्र भी बहे तो सोचोगे इसी से प्यास बुझा लूं। प्यास नहीं बुझेगी, पर जीवित रहूंगा। जीवित रहा तो आगे कहीं प्यास बुझा लूंगा। प्यास ही नहीं है तो नदियां बहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई कहे तो जबरदस्ती पी लोगे। प्यास लगी हो और चारों तरफ समुद्र ही हो, तो प्यास नहीं बुझेगी, फिर भी जीवित रहने के लिए वह पानी पी लोगे। जो उपयोग के लायक नहीं, उसे भी जरूरत में उपयोग कर लिया। वैसे ही जरूरत बनानी पड़ेगी कि अब आत्मिक कल्याण करना है। समझ में आ गया कि मेरी जरूरत आत्मिक कल्याण है। जितनी जरूरतें थीं, वे शरीर तक थीं। शरीर की जरूरत को अपनी जरूरत समझ लिया था। इनको अलग अलग करके देखना पड़ेगा। अलग करके देख पाओगे तो अपनी जरूरत मिटाने के लिए किसी का भी सदुपयोग कर लोगे।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03