प्रश्नोत्तर P6-0065 · भाग 6
साधक आत्मिक रास्ते पर यह कैसे समझे कि वह सही रास्ते पर जा रहा है? कैसे पता चले कि हम अध्यात्म में हैं या नहीं? आए हुए सात दिन हुए हैं। बोलने से मना था, फिर भी बोल दिया। नियम पूरी तरह नहीं निभा।
तुम पूरी तरह यहां के नियम में जिए हो, कह सकते हो? तो तुम प्रश्न न करो। तुम पीछे चले जाओ। न जीने का कारण बता सकते हो? क्यों नहीं रहे नियम में? बोलने के लिए मना था, फिर भी बोले। क्यों बोला? तुम्हें यहां कोई जवाबदारी है? तुम्हें कुछ करना है? अरे, तुम खाकर अपना आत्मिक कल्याण नहीं कर सकते, तो तुम्हें करना होगा क्या? तुम अपना आत्मिक कल्याण करोगे जब तुम्हें सारी व्यवस्था देने के बाद यहां कुछ सोचना ही नहीं है। क्या आपको कुछ सोचना ही नहीं है? और फिर आप नियम में नहीं रह रहे हो। अगर तुम्हें सोचना पड़ता, सारी व्यवस्था करके अगर साधना करनी पड़ती, तो तुम्हारा क्या होता? बोलो तो। क्यों नहीं नियम में रहे? उसका कारण क्या है, बताओ।
तुम्हारी जिंदगी से आत्मिक कल्याण बड़ा दूर है। जिस चाल से चल रहे हो, लाखों जन्म में भी संभव नहीं है। क्या तुम्हें लगता है नियम तोड़ना अनिवार्य था? जरूरी था? टूटने का कोई कारण था? बोलो। जवाब दो। समय मत बर्बाद करो। उसके पीछे कोई कारण है? क्या कारण था उसके पीछे? एक व्यक्ति तुम्हारे लिए दिन-रात लगा है, कि तुम्हारा कैसे आत्मिक कल्याण हो जाए। तुम्हें यहां सोचना भी नहीं है। चाहे तुम आजीवन रहो। तुम्हारे घर पर एक-दो दिन के लिए मेहमान आ जाए, तो एक दिन, दूसरे दिन सोचोगे कि तीसरे दिन कब जाए। या तुम कहीं चले जाओ। परिवार में भी अगर तुम कुछ न करो और तुम रहो, तो वह भी तुम्हें बर्दाश्त नहीं करेंगे। तुम्हारे मां-बाप भी। और एक व्यक्ति जंगल में तुम्हारे लिए सारी व्यवस्था कर दी है, कि कैसे भी तुम्हारा आत्मिक कल्याण हो जाए, वह भी तुम नहीं कर रहे हो। तुम कितने गए-गुजरे हो। तुम सोच भी नहीं सकते।
यह एक व्यक्ति तुम्हारी व्यवस्था के लिए हर वक्त लगा है। आप दो-चार परिवार पालते हो तो आप पूरी जिंदगी परेशान रहते हो। दिन-रात काम करते रहो तो भी तुम्हारा कभी भरा नहीं। आपको एडजस्टमेंट ही करना पड़ता है। बचा-बचाकर ही करना पड़ता है। और यहां आपको पूरी तरह छूट है। आपको सोचना ही नहीं है कुछ। व्यवस्था के लिए सोचना ही नहीं है। सारी व्यवस्था मिलने के बाद भी, एकांत से लेकर सत्संग से लेकर, भोजन से लेकर रहने तक, सारी व्यवस्था मिलने के बाद भी तुम अपना आत्मिक कल्याण नहीं करते। मतलब तुम अपने लिए नहीं जी सकते, और वह व्यक्ति तुम्हारे लिए जी रहा है। हम भी तो जंगल में पड़े हैं। हम तुम्हारे लिए पड़े हैं, और तुम अपने लिए नहीं पड़ रहे हो। और कह रहे हो, मैंने नियम तोड़ दिया। नियम टूटने का कोई आधार है क्या? बताओ, क्यों तोड़ना पड़ा? क्या तुम्हें यहां कोई कमी थी? क्या कमी को पूरा करने के लिए तुमने नियम तोड़ा? नियम तोड़ो या पालन करो, हानि-लाभ किसको होगा? तुम्हें होगा। मुझे थोड़ी न होगा।
अगर तुम नियम में भी रहे तो लाभ तो तुम्हें ही होने वाला है। नियम तोड़ोगे तो हानि तुम्हें होने वाली है। मैं तो उससे बड़ा दूर हूं। मैं तो तुम्हें एक व्यवस्था दिया हूं। मैं तुम्हें अभी भी सचेत कर रहा हूं कि आप इस व्यवस्था का सदुपयोग करो। नहीं तो यह भी छीन लिया जाएगा। जिससे बात की, उसका भी नियम टूटा। अगर तुम नहीं बात करते, तो उसको नियम तोड़ने का मौका नहीं मिलता। अगर वह प्रयास भी करता, तो तोड़े किसके साथ? आप जहां भी गए हो, जिसके लिए गए हो, सिर्फ वही करो। इस जगह पर, इस कुटिया का निर्माण आत्मिक कल्याण के लिए हुआ है। ये व्यवस्थाएं उसके लिए हैं जिसको आत्मिक कल्याण करना है। आपको बात करने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है। जाओ, सब खोज रहे हैं। तुम्हें कितने लोग मिलेंगे? नहीं मिलेंगे क्या? यहां क्या जरूरत पड़ गई? यहां जरूरत नहीं है।
अभी भी कद्र करो। नहीं तो एक दिन सब हाथ से छूट जाएगा। सिर्फ रोने के अलावा कुछ नहीं रहेगा। अगर कुछ मिलता है, उसका कद्र करना सीखो। तुम प्रश्न के लायक हो? तुम्हें लगता है कि तुम प्रश्न के लायक हो? तुम तो यहां रहने के लायक भी नहीं थे। लेकिन फिर भी मैंने कहा, जाने दो। नियम टूटा है, कोई बात नहीं, रहने दो, सुधर जाएगा। तुम प्रश्न के लायक अभी नहीं हो। अभी प्रश्न के लायक बनो।
यहां पर ऐसी कोई बात ही नहीं है कि नियम तोड़ना पड़े। न कोई मालिक है कि आपको कुछ पूछना हो, उसका आदेश लेना हो, या रोज आकर मुझे माथा टेकना हो। ऐसी कोई बात नहीं है। नहीं कि मुझे देखते ही उड़ जाना है, ऐसा भी कोई बात नहीं है। यहां इतनी स्वतंत्रता है कि यहां कोई मां ही नहीं है। सब अपने-अपने काम में लगे हैं। मैं अपने काम में लगा हूं। आप लोग अपना काम करिए। किसी से कोई मतलब भी नहीं है कि मुझे देखकर तुम्हें उठना ही है। मेरा तो बस एक ही कहना है कि आप जिसके लिए आए हो, उससे ही मतलब रखो। मुझसे भी मत रखो। मेरे शब्दों से मतलब रखो बस। क्योंकि इन शब्दों के द्वारा ही कल्याण छिपा हुआ है। इस शरीर से कोई मतलब मत रखो। इतनी स्वतंत्रता में भी तुम भटक रहे हो। न कोई दबाव है, न कोई मालिक है। न ऐसा है कि सुबह-शाम उठकर तुम्हें माथा टेकना है। पता चला बैठे हो, सामने मैं निकला, आकर माथा टेक दो, ऐसी कोई बात ही नहीं है। इतनी स्वतंत्रता के बाद भी तुम कह रहे हो, मैं गिर रहा हूं। आप सोचो, मैं कहां हूं। आप कल्पना करिए कि तुम कहां हो।
ये लोग जब एक साल के अंदर आए थे, तो मैं सोलह-सोलह, अठारह घंटे सत्संग करता था। सब सोए हुए थे यहां। मैं सुबह उठ गया। मैं लगभग दो बजे सोया था। सुबह पांच, साढ़े पांच बजे इनको उठकर बिस्किट खिलाया। कहा, पानी पी लो बेटा, आराम से जाना। पता नहीं आप लोग कब किसी की मेहनत को समझोगे। कितने गए-गुजरे हो। दो बजे व्यक्ति सोया है और पांच बजे उठकर इसको बिस्किट दे रहा है। और दिन भर वह काम किया है। तुम लोग सच में बहुत गए-गुजरे हो। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। तुम जैसे हो, वैसे ही सामने वाले को समझते हो। मैं सोच रहा हूं, कैसे तुम लोग अपना आत्मिक कल्याण करो। पहले ज्ञान खोजा, अपनी जिंदगी लगाकर। फिर मैंने यह व्यवस्था की। कैसे-कैसे कर रहा हूं, मुझे पता है। और तुम लोग आकर ठिठोली मार रहे हो, गप मार रहे हो। यह शर्म की बात है। सोचो, सोलह घंटे। दो बजे रात को सोने गया, सुबह पांच-साढ़े पांच इसके लिए उठ गया। मैंने नहीं कहा था कि मैं उठूंगा। लेकिन मैंने कहा, नहीं, यह जा रहा है। इसे यह नहीं लगना चाहिए कि मैं अनजान जगह से जा रहा हूं। एक व्यक्ति का जीवन लग रहा है। क्या देखकर, क्या समझकर उसने ऐसा किया, और तुम लोग उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हो। कितने गए-गुजरे हो। तुम सोचो अपने बारे में।
फिर मैं उठकर कह रहा हूं, आराम से जाना, अपना ख्याल रखना। एक आदमी कहां-कहां झांकेगा, बताओ? तुम सोच नहीं सकते। तू कितना गिरा हुआ आदमी है। और तेरी ऐसी दुर्दशा होने वाली है, तू कल्पना भी नहीं करता। अभी भी समय है तेरे पास। मैंने यहां एक भी ऐसी चीज नहीं रखी कि आपको किसी से कहना पड़े। किसी वस्तु पर ताला लगा हो, ऐसा नहीं। सब खुला है। यहां एक भी ऐसी कमी नहीं जिसे आपको बोलना पड़े। मैंने व्यवस्था में कोई कमी छोड़ी ही नहीं। पता नहीं आप लोग कब समझोगे।
मैं इस पृथ्वी पर जितना ज्ञान हो सकता था, सब कुछ समझकर प्रत्यक्ष ज्ञान लाया, उतारा। मैंने मांगा कि इतना सरल ज्ञान दो कि हर व्यक्ति इस भवसागर को पार कर ले, आत्मिक कल्याण कर ले। फिर इसके बाद अनेकों आश्रम देखे। हर आश्रम से कुछ अलग लेकर मैंने यहां निर्माण किया। आप इतनी संस्थाओं में गए हो। एक संस्था ऐसी है क्या, बताओ, जहां ऐसी व्यवस्था हो? नहीं है। मैंने बारह साल के भ्रमण के बाद अपनों की कुटिया का निर्माण किया है। और मैं बहुत सोच-समझकर किया हूं। अगर ऐसा स्थान होता तो मैं नहीं करता। प्रत्यक्ष ज्ञान होता तो मैं नहीं लाता। था, तो लाने की क्या जरूरत थी? मैंने बहुत सोच-समझकर ऐसा ज्ञान, ऐसी व्यवस्था लाई है। मेरा भाव है, कम से कम तुम उपयोग तो करो। तुम अपने लिए उपयोग नहीं कर सकते। जिसने तुम्हें सहारा दिया, तुम्हारे आत्मिक कल्याण के लिए, उसी को तुम रुला रहे हो। तुम कितने गिरे हो?
तुम इन आंसुओं की भरपाई कर सकते हो? क्योंकि ये आंसू कामनाओं और वासनाओं में नहीं गिरे हैं। ये प्रेम के आंसू हैं। इसकी भरपाई तुम कहां करोगे? ये आंसू किसी उम्मीद में नहीं गिरे, कि तुमने उम्मीद पूरी नहीं की इसलिए गिरे। तुम्हारे लिए गिरे। तुम्हारे अपराध पर गिरे। तो तुम इस आंसू की भरपाई कैसे करोगे? और भरना पड़ेगा तुम्हें। क्योंकि जिसके पास आए, जिसकी शरण ली, और तुम उसी को रुला दोगे, तो तुम्हें भरना ही पड़ेगा। और तुम्हारे भरने में लाखों जन्म चले जाएंगे। इस आंसू की भरपाई के लिए तुम्हें लाखों जन्म लग जाएंगे। तुम आंसुओं को ऐसे न समझ लेना। जिसने शरण दी, तुम्हारे लिए शरण दी, और उसे चाहिए कुछ नहीं। और तुम उसी को रुला दो, तो क्या होगा तुम्हारा? तुम्हारी कल्पना से परे।
आंसू मुझे इसलिए आते हैं कि तुम्हारी फिक्र है। अगर मुझे फिक्र नहीं होती, मुझे यह आश्रम बनाना नहीं होता, यह सब नहीं बनाना होता, तो मुझे आंसू भी नहीं आते। तुम चाहे नियम तोड़ो, चाहे कुछ भी करो, हमको क्या मतलब? तुम्हारी फिक्र है। इसलिए आंसू आ जाते हैं कि तुम्हें तुम्हारी फिक्र नहीं है। पता नहीं तुम कैसे हो। एक अनजान व्यक्ति को तुम्हारी इतनी फिक्र। मैं इसका नाम भी नहीं जानता। कहां से आया, यह भी नहीं पता। एक अनजान व्यक्ति को इतनी फिक्र है, और तुम्हें तुम्हारी फिक्र ही नहीं है। तुम कहां जी रहे हो? तुम कहां हो? अगर फिक्र होती तो तुम नियम कभी नहीं तोड़ते।
जब हम एक साल सेवक रूप में थे, तो साधक लोग खा लें, उसके बाद मैं खाऊं। पूरी तरह जिस नियम में साधक रहे, उसी में मैं भी रहा। जैसा नाश्ता उनको मिले, वैसा मुझे मिले। वह काढ़ा पिए, मैं काढ़ा पिऊं। लेकिन उनके बाद। एक दिन की घटना है। वे लोग भोजन करने जा रहे थे। मैं भी भोजन करने जा रहा था। मुझे पता चला कि मैंने कौर जल्दी उठा लिया, और मुझे आंसू आ गए। मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। फिर मैंने कहा, नहीं, अब जब देखूंगा कि ये लोग खा रहे हैं, तब मैं जाऊंगा खाने। शरीर भोजन मांगे, क्योंकि मैं इतना काम करता था। रात को जाऊं तो भूख लग जाए। लेकिन मैं पहले खाऊं ही नहीं। अपने आप को कहां रखा था। मुझे कोई देखने वाला थोड़ी न था। लेकिन मैं तो था। मैंने अपने आप को पकड़ लिया। तोड़ने से पहले ही देख लिया। तुम क्यों तोड़ रहे हो? जरा सोचो। तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें जवाब भी देना पड़ेगा? तुम्हें एक दिन खड़ा किया जाएगा। आप यह मत समझना। आपको एक दिन खड़ा किया जाएगा, और पूरा हिसाब-किताब देना पड़ेगा। और उसी निर्णय पर आप आगे जाओगे। आप यह मत समझना कि जैसा चाहो वैसा जी लिया, निकल लूंगा। नहीं। एक दिन ऐसी जगह खड़े होगे जहां हिसाब दोगे। उस हिसाब में पता चलेगा कि आप कहां जाओगे।
तुम्हें अभी पता नहीं है, तुम कितने नीचे गिर रहे हो। इस आंसू की भरपाई कर देगा क्या? इसके बस में है क्या? जब भरना होगा, तभी पता चलेगा। अभी समझ में थोड़ी आएगा। आपका जैसा कर्म है, उसी हिसाब से आप आगे जाओगे। वही आपको ले जाएगा। जब हिसाब होगा, अपना हिसाब तुम ही लगा लो, कि अभी तुम कहां जाओगे। एक दिन बैठकर अपना हिसाब करो। गुणा-भाग करो। तुम अपने आप को नरक के द्वार पर ही पाओगे। करके देख लो। नरक का द्वार मतलब दुख का भवसागर। दुख, घुटन, व्याकुलता, उदासी, तड़प, बेचैनी, चिंता, असाध्य रोग। असाध्य रोग मतलब जिसका इलाज ही नहीं। वहां तुम अपने आप को पाओगे।
अभी भी समय है। सोचो। जिसने शरण दी, मैं उसका नाम भी नहीं जानता। जिसने शरण दी, सारी व्यवस्था की, कि तुझे कोई कमी नहीं होगी, तू आराम से रह। उसको रुलाकर जा रहा है। इसका क्या होगा? मैं देख पा रहा हूं। तुम्हारे लिए आंसू मतलब पानी है। मैं समझ रहा हूं कि इसका क्या होगा।
कहा गया है, जस करनी तस भोग, विधाता। नरक जाते ही तुम पछताते। तुम तो तब पछताते हो जब हो जाता है। लेकिन उसके पहले तुम्हारे पास समय था। कर्म पहले है, परिणाम बाद में आता है। काश जब कर रहे थे तभी संभल जाते। उस समय तो मजा ले लेते हो। बाद में जब नरक जाते हो, तब पछताते हो। फिर क्या होने वाला है? भोगो। पता नहीं कितना भोगोगे। चौरासी लाख योनि कही गई है। सोचो, एक-एक योनि की आयु कितनी होती है। ऐसे जीव हैं जो हजार साल से भी ऊपर जीते हैं। इतना हमने खोज किया है। पता नहीं इससे भी ज्यादा होंगे। चौरासी योनियों में जाओगे तो कितने लाखों साल ऐसे रहोगे। कल्पना भी नहीं कर सकते।
पालतू जानवर की बात अलग है। जंगल में रहने वाले जानवर जब बीमार पड़ते हैं, क्या कोई इलाज करवाता है? सड़कर मर जाते हैं। तड़प-तड़पकर मर जाते हैं। जंगल का जानवर पूरी जिंदगी डर में, सदमे में जीता है। उसके पीछे कर्म ही है। यह मानव तन मिला है। अभी भी संभल जाओ। अपने उद्धार में लग जाओ। नहीं तो एक दिन चला जाएगा। योग करने आए थे, भोग करने लगे। योग की जगह भोग हो रहा है, तो क्या परिणाम मिलेगा? बात करके कुछ रसपान ही लिया। कोई जरूरत तो थी ही नहीं। पहले उसके नियम को स्वीकार करता हूं, फिर धीरे से नियम तोड़ता हूं। काश तू पहले ही कह देता कि मैं नियम में नहीं रह सकता। रखना हो तो रखो, नहीं तो मत रखो। लेकिन तू इतना भी ईमानदार नहीं। पहले स्वीकार करता है कि पूरी तरह नियम में रहूंगा, फिर छुप-छुपकर नियम तोड़ता है। नियम टूटने के बाद आकर खड़ा हो जा, बता दे कि नियम टूट गया, मुझसे अपराध हुआ। इतने दिन का समय भी मिला। अगर टूटने के बाद व्यवस्थापक के पास जाकर कह दे कि नियम टूट गया, अब बताओ मैं क्या करूं, दंड क्या है, इतना ईमानदार हो तो नहीं गिरेगा। किसी का प्रभाव हावी हुआ, चाहे मेरा चाहे उसका। ईमानदार होता तो जाकर बोल देता। देख लो क्या कर रहे हो। सबका हिसाब देना पड़ेगा।
यह मत समझना कि बुरा किया, अच्छा कर दूंगा, सेटिंग हो जाएगी। नहीं। एक का अलग भोगना पड़ेगा, दूसरे का अलग। प्लस-माइनस नहीं होता। तुम प्लस-माइनस के चक्कर में हो। तुम्हारे जीवन में प्लस-माइनस होते हैं। प्रकृति के हिसाब में प्लस-माइनस नहीं होता। कृष्ण के माता-पिता ने क्या ऐसा सत्कर्म किया था कि कृष्ण जैसा पुत्र हुआ? कुछ सत्कर्म उसके पीछे रहा होगा। और क्या ऐसा दुष्कर्म किया होगा कि छह पुत्र उनके सामने पटककर मारे गए? रामकृष्ण परमहंस को उपलब्धि हुई, वह सत्कर्म का फल था। कैंसर से तड़प-तड़पकर गए, वह दुष्कर्म का फल था। महापुरुष भी नहीं बचता। दोनों का परिणाम अलग-अलग मिला। यह मत सोचना कि माइनस और प्लस कट जाता है। एक-एक का हिसाब करना पड़ेगा। बचकर निकल ही नहीं सकते।
तुम सोचते हो, सिस्टम से छुपकर कुछ कर लूंगा। सारा सिस्टम तुम्हारे अंदर फिक्स है। कैमरा लगा है। तुम समझते हो, किसी ने नहीं देखा, चुपके से कर लूं। देखने वाला मुख्य तो तुम ही हो। तू देखकर ही कर रहा है। अपने से छुपाकर कोई कुछ कर सकता है क्या? तू बचेगा नहीं।
बस पूछ लिया। कैसे पता चले कि हम अध्यात्म में हैं कि नहीं? तू अध्यात्म में है? तू इंसान तो सही से है नहीं। अध्यात्म की कल्पना ही मत कर। तू उससे कोसों दूर है। तू संसार के लायक अभी नहीं है। नॉर्मल जिंदगी के लायक नहीं है। जिसकी शरण में है, उसी से विश्वासघात कर रहा है, तो अध्यात्म कहां। प्रश्न पूछ लेने से आध्यात्मिक थोड़ी हो गए। जब प्रश्न पूछो, तो देखो कि उस उत्तर के लायक भी हो या नहीं। क्या यह प्रश्न तुम्हारी योग्यता का है, कि बस ऐसे ही पूछ लिया? जैसे किसी वस्तु का नाम ले लिया। क्या तू उस वस्तु के लायक है? गाड़ी का नाम ले लिया। देख, तू उस गाड़ी के लायक भी है क्या? लेने की बारी आएगी तब क्या होगा? आत्मिक कल्याण करने की बारी आई तो कर पाएगा क्या? नहीं कर पाएगा, तो क्यों पूछ रहा है? सामने वाले का समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तेरे समय की कीमत नहीं है, तो कम से कम सामने वाले को समझ। अलग-अलग शोरूम में जाकर गाड़ियां देखता है, लेना कुछ नहीं है, सबका समय बर्बाद करता है।
जिस प्रश्न को पूछ रहा है, क्या उसके लायक है? उत्तर को पचा पाएगा क्या? पूछने से पहले देख, क्या मैं इस प्रश्न के लायक हूं? उत्तर मिला तो संभाल लूंगा क्या? जीवन में उसका उपयोग कर पाऊंगा क्या? बस ऐसे ही नहीं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूछना चाहिए। अपनी सामर्थ्य जांचो। सामर्थ्य के अंदर पूछोगे तो उन्नति होगी। मैं कुछ कहने जा रहा हूं, कुछ पूछने जा रहा हूं, तो मेरी सामर्थ्य इस कहने की है या नहीं, इस पूछने की है या नहीं। ऐसे ही किसी का समय बर्बाद मत करो। नहीं तो उस समय की भी भरपाई करनी पड़ेगी, जो बिना मतलब ले लिया। यहां सबका हिसाब होता है।
कहानी सुनी होगी। कहानी सही है या गलत, मुझे मतलब नहीं। सुदामा चावल ले गए। कृष्ण ने एक मुट्ठी खाई, कहते हैं एक लोक दे दिया। दूसरी मुट्ठी खाने गए तो रुक्मणी ने हाथ पकड़ लिया। कृष्ण बोले, भूल गईं क्या? वह बोलीं, प्रभु, सब दे दोगे क्या? यह बात सुदामा को पता नहीं। उनके बीच की बात है। सुदामा खुद न खाकर तुम्हें खिला गया था, उसकी भरपाई तो करनी पड़ेगी। आगे से आदिशक्ति, जगतजननी कर रही हैं। जब वह यहां का खाकर नहीं बचे, तो तुम खाकर बच जाओगे? आधे चावल का हिसाब देना पड़ा। सुदामा की पत्नी जबरदस्ती भेजती है। साढ़े तीन मुट्ठी लेकर जाते हैं। समझना यह है कि एक-एक कण का हिसाब देना पड़ेगा। एक-एक अन्न का हिसाब देना पड़ेगा। यह मत समझना कि खा लिया, हो गया। यहां से तब निकलोगे जब एक-एक कण का हिसाब हो जाएगा, लेन-देन खत्म होगा। दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है, यह कहते हो। नाम लिखा है तो भरना भी पड़ेगा। इसलिए सोच-समझकर जीवन जियो।
आने वाले साधकों से, जिज्ञासुओं से, यही कहता हूं। यहां के नियम में रहना। पूरी तरह आकर। मुझसे भी मतलब मत रखना। मेरे द्वारा जो शब्द निकल रहे हैं, उनमें जीना। उसी में कल्याण है। नियम में जीना। नियम सर्वोपरि है। नियम में ही उद्धार छिपा है। आगे जैसा करोगे, वैसा परिणाम सामने आएगा। मैं रहूं या तुम रहो। एक समय आएगा, हिसाब-किताब होगा। तब देख लेना क्या होगा। वहां नहीं बचोगे। आज समाज की नजर से बच जाओगे, भीड़ से बच जाओगे। हिसाब के समय नहीं बचोगे। पूरी भरपाई करनी पड़ेगी। उसी हिसाब से आगे जाओगे।
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