प्रश्नोत्तर P6-0099 · भाग 6
गृहस्थ और सामाजिक रहते हुए क्या आत्मज्ञान संभव है? आसान है या कठिन?
नहीं, बहुत कठिन है। इसलिए कठिन है कि एक जगह रह रहे हो, जैसे सात दिन आप यहां रहे, तो सात दिन में कोई तू-मैं नहीं हुआ। जब भी सोकर उठे, सत्कर्मी हुआ। इतना तुम्हारे घर पर थोड़ी मिलेगा। तुम्हारे परिवार में ही तू-मैं रोज होती है। कोई न कोई नाराज, दुखी रहता ही है। तो जितना आसान एक जीवंत गुरु की शरण में है, उतना घर में नहीं।
वैसे भी अगर ऐसे आश्रम में रहो, जहां उपलब्धि नहीं हुई, तो घर से ज्यादा बवाल है। घर से ज्यादा पंचायत है। अगर जीवंत गुरु है, आत्मज्ञानी है, और उसके शरण में रह रहे हो, तो जल्दी निकल सकते हो। अगर किसी ऐसे आश्रम में रह रहे हो, जहां उसको उपलब्धि नहीं हुई है, तो वहां राग-द्वेष बहुत ज्यादा होता है। ऊंच-नीच, राग-द्वेष, हर समय यही चलता है। तो आप और ज्यादा फंस जाओगे।
इसीलिए चिल्ला-चिल्लाकर गुरुओं ने कहा है कि जीवंत गुरु ढूंढो। जीवंत गुरु का सानिध्य ही आपको उभारेगा, तारेगा, आपके कल्याण में सहायक बनेगा। जीवंत गुरु के सानिध्य में रहो। वह चाहे जहां रह रहा हो। जीवंत गुरु वह है, जो अपने स्व में स्थिर हो गया हो। वह आत्मज्ञानी हो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31