प्रश्नोत्तर P7-0014 · भाग 7
आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी और सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है?
जैसे हम भोजन करते हैं, उस अनाज का नाम मुझे कुछ मालूम हो या ना हो, अगर हम खाएँगे तो पेट तो भरेगा, और अनाज मुझे पोषण देगा कि नहीं देगा। क्या पोषण के लिए अनाज का नाम जानना जरूरी है? कोई जरूरी नहीं। जल पीते हैं, प्यास बुझती है, चाहे हम पानी की परिभाषा जाने या ना जाने। कहने का मतलब यह कि आप ईमानदारी और सत्कर्म करेंगे।
ईमानदारी का काम है, आगे बंधन नहीं बंधने देगा। और सत्कर्म का काम है, आपको बल देगा, और आपके पिछले जितने भी कर्म हैं, जो आपने किए हैं, उनका नाश होगा। और एक समय आएगा, उस परम स्थिति पर उपलब्ध हो जाएँगे। साफ-सुथरी बात है।
आप कपड़ा पहने हैं। क्या सब लोग जानते हैं कपड़ा कौन सा है, क्या है, इसकी क्वालिटी कहाँ से आई है, कहाँ का बना है? कुछ जानते हैं? लेकिन आपका तन ढक रहा है। स्वेटर पहनते हैं, आपको पता है कौन सा धागा कहाँ का यूज हुआ है? लेकिन वह आपको ठंड से बचा लेता है कि नहीं? यही है। ईमानदारी और सत्कर्म आपको आपसे मिला देगा। बात खत्म।
जीवन में अपना लीजिए ईमानदारी। और सत्कर्म तपस्या है, तप है। आपको आपसे मिला देगा। ऐसा तप है कि आपसे आपको मिला देगा। सब छोड़ देंगे आपको। ईमानदारी और सत्कर्म अपना लोगे तो कोई आपको पूछेगा ही नहीं। क्या ईमानदारी और सत्कर्म अपनाते ही लोग आपको छोड़ने लगेंगे? क्योंकि ईमानदार व्यक्ति जैसा है वैसा बोलेगा, तो उसे पसंद कौन करेगा? और भगवान पसंद करने लगेंगे।
कबीर कहते हैं, कबीरा मन निर्मल भयो जैसे गंगा का नीर। पीछे-पीछे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर। भगवान पीछे-पीछे दौड़ के आएँगे, तुम्हारे हृदय में वास करने। निर्मलता आ गई ईमानदारी से।
यह नहीं करोगे, कुछ भी करो, भटकते रहो। यह नहीं करिए, कुछ भी करिए, भटकते रहोगे। पकड़ यही है। छोड़ने के लिए यह मूल है। ईमानदारी से मुक्ति दे रही है, बाकी सब बाकी है। मूल यह है। कुछ अपनाओ या ना अपनाओ, यह पक्का अपना लो जीवन में।
और सबसे ज्यादा हम बेईमानी करते हैं बोलचाल में। सबसे ज्यादा झूठी बड़ाई, झूठी निंदा, झूठी चापलूसी, आकर्षित करने के लिए बातचीत करना, प्रभावित करने के लिए बातचीत करना, जो नहीं हो उसे सिद्ध करना, अपने काम को बनाने के लिए लोगों को आकर्षित करने के लिए बातचीत करना, अपना बैकग्राउंड बताना। बैकग्राउंड की जरूरत नहीं, फिर भी बता रहा हूँ, मैं यह हूँ।
कोई आवश्यकता नहीं। कोई आवश्यकता ही नहीं है। कोई पूछ भी नहीं रहा है, फिर भी जाते ही बता रहे हो, मैं यह हूँ। पूछा कौन? अध्यात्म में या कहीं भी इसकी जरूरत कहाँ है? केवल उस जगह पर है जहाँ आप काम कर रहे होंगे। बस, इसके अलावा कहीं जरूरत नहीं। आप जहाँ कर्म कर रहे हो वहाँ आपका परिचय बताना जरूरी है, कि लोग आपका लाभ ले सकें। वह भी सेवा के लिए। वह भी ऐसा थोड़े ही, मान के लिए।
भाई, एक डॉक्टर क्लीनिक का बोर्ड लगा देता है, तो बड़ी आसानी से लोग उसे खोज लेते हैं। अब सोचो, वह अपने पीठ पर लिखवाए, या हर जगह जाकर बोले, कोई मतलब नहीं। देख लीजिए, जरूरत है तो कर दे। जरूरत है तो कर दे। तो कहने का मतलब है, मेन ईमानदारी और सत्कर्म है। आप इसे कोई साधारण बात ना समझिए। यही तो आप नहीं कर रहे, इसलिए तो भटक रहे हो।
कितनी विधियाँ अपना लीं, कुछ हुआ? आप और ग्रसित हो गए। आप विधियों के पहले अपना जीवन देख लो, विधियों के बाद देखो। आप पाओगे, मैं ज्यादा परेशान हूँ। आप तो बस अपने आप को सांत्वना दे रहे हो। आप हकीकत में बात करिए, आप पाओगे आप ज्यादा परेशान हो। जिसके लिए किया, वह हुआ ही नहीं। जिसके लिए आपने विधियाँ अपनाईं, जिसके लिए आपने साधना अपनाई, वह हुआ ही नहीं। तो समझौता कर लेते हो। करके कर थक गए, तो समझौता करके लोग बैठ जाते हैं, चलो अगले जन्म में देखेंगे। इस जन्म में नहीं होगा तो अगले जन्म में कैसे? अगले जन्म में शरीर बदलेगा, तुम ही तो रहोगे। पुराने जीव के संस्कार भी बने रहेंगे। वह भी बना रहेगा तो बना रहेगा ना। वह तो जारी रहेगा।
तो ईमानदारी और सत्कर्म सबसे जरूरी है। ईमानदारी और सत्कर्म मेरे को कर्ता से छुड़ा देता है। आप इसे कोई साधारण शब्द ना समझिए। यह साधारण बात नहीं है। मेन यही है। यह कह सकते हैं कि हर विधि का लक्ष्य यही है। विधियाँ भी मान लीजिए, उनके लिए भी यही अपनाकर विधियाँ करनी हैं। ईमानदारी और सत्कर्म ही आपको आपसे मिलाए, यह पक्का है। अगर आप कर्म कर रहे हैं, तो विधियाँ पकड़ने से भी ज्यादा जरूरी है ईमानदारी और सत्कर्म। नहीं तो विधियाँ आपका पतन कर देंगी।
राक्षसों को भी तो दर्शन हुए। क्या हुआ, बताओ? और घातक हो गए। और भी उनका पतन हो गया। वैसे ही अगर बेईमानी और दुष्कर्म जीवन में हो। राक्षस कौन? बताइए। क्या राक्षस मतलब इतना मुँह, इतना हाथ? बेईमानी और दुष्कर्म। अगर आपके जीवन में है तो आप राक्षस हो, दुष्कर्मी राक्षस। धर्मशाला वगैरह, भंडारा वगैरह करा रहे हो, लोगों की सेवा कर रहे हो, तो आप देवत्व भाव में हो, ईमानदारी और सत्कर्म में लगे हो। जरूरतमंद की सेवा कर रहे हो तो सात्विक भाव है। क्या आप अपने आप को मानव बोल सकते हो? ज्यादा संख्या आपको किसमें मिलेगी? राक्षस में ज्यादा मिलेगी। फिर कुछ कम देवता। और फिर एकाध ईमानदारी और सत्कर्म वाले। अब देखो, तुम उस एकाध में हो या नहीं। नहीं हो तो फिर कहाँ हो? राक्षस में। क्योंकि जब आप बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हो तो आप एक राक्षस हो। और राक्षस विधियाँ करेगा तो राक्षस और पतन करेगा।
आप जब से विधियाँ अपनाए हो, सबसे ज्यादा आपका परिवार परेशान है। विधि का लक्ष्य अगर ईमानदारी हो, पीछे ईमानदारी छिपी हो, ईमानदार और सत्कर्मी बनना हो, तो आप बना सकते हो। विधियाँ क्यों बनाएंगे? विधियाँ कैसे बनाएंगे? ईमानदारी और सत्कर्म बताइए कैसे किए जाएँ? यह तो आपके हाथ में है। मैं कह रहा हूँ, जब यह आप ही के हाथ में है तो काहे को आप नहीं कर लेते? क्यों विधियाँ? जब हम फैसला लेकर तुरंत जगह पर कर सकते हैं, तो जितना हम विधियाँ करने में समय लगाएँ, उतना सत्कर्म में लगाएँ, तो हमारी जल्दी यात्रा होगी। जिस काम को हम तुरंत कर सकते हैं, विधियों द्वारा क्यों करें? आप बताइए।
सही है कि पूरे चिंतन में यह धारणा बनी हुई है, कि कोई चीज है तो उसको मिटाने के लिए यह तरीका है, तो तरीका ही विधि हो गई। तो मैं कह रहा हूँ, साफ-साफ एक तरीका आपके पास है। अभी छोड़ दो, और ईमानदारी से कर्म करो। यह नहीं जम रहा है। आपको यह नहीं जम रहा है। जिस काम को आप तुरंत कर सकते हो, आपके हाथ में है, और आप कह रहे हो कि हम विधि द्वारा करेंगे। प्रत्यक्ष बिल्कुल हमारे हाथ में है। कोई कल्पना नहीं। वही एकदम पक्का विचार है। पक्का कर लीजिए। बस आज के बाद बेईमानी और दुष्कर्म, क्या करता हूँ, बस खत्म। बात हो गई। इतनी सी बात।
हम क्यों विधियाँ अपनाएँ? जिस काम को तुरंत हम कर सकते हैं, विधियाँ क्यों अपनाएँ? आप बताइए। हमें तो कोई विशेष प्रयोजन नजर नहीं आता। लेकिन यह कि जैसे हर चीज की आदत पड़ी हुई है, तो विधियों की भी आदत पड़ी हुई है। हमने मान लिया है कि यह वाला यज्ञ कर लेंगे तो भगवान, देवता, या कोई काल्पनिक चीज हमें वरदान दे देगी। यह हमारी एजुकेशन में, हमारी परवरिश में, हमारे बड़े होने में सब चली आ रही है। अच्छा, विधियाँ करने में समय दोगे। विधियों से बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ना चाहोगे। पता नहीं छूट पाएगा कि नहीं, क्योंकि ताकत आएगी, ऊर्जा मिलेगी, और पतन करोगे। लेकिन आपके हाथ में तुरंत था। और जितना विधियों में समय लगाते, उतना सत्कर्म में देते, आपका जल्दी कल्याण हो जाता। लेकिन आप अपना कल्याण करना ही नहीं चाहते।
विधिपूर्वक सत्कर्म कर सकते हैं कि नहीं? सत्कर्म तो जरूरतमंद की सेवा है। उसमें विधि की जरूरत नहीं है। जरूरतमंद की सेवा, बस इतना है। यही सत्कर्म। इसी को सत्कर्म कहते हैं।
जैसे अभी उस कुतिया के लिए हमने देखा, वह लंगड़ा रही थी। मैंने उसको देखा। वही कुतिया इनके सामने खड़ी नहीं हो रही थी, भाग रही थी। मैंने कहा, जरा देखो क्या है। नहीं खड़ी हुई। और हम गए तो उसने खड़े होकर रुकी। हमने उसका पाँव हाथ में लिया, देखा, तो उसमें मवाद था। दवा मँगवाई। करुणा को अनुभव कर लिया होगा। मैं वही कह रहा हूँ। उसे मैंने महसूस किया। आखिर वह मुझे भी नहीं जानती, उन्हें भी नहीं जानती। अगर देखती है तो इनको भी देख रही है, मुझे भी देख रही है। तो जाते ही कैसे सो गई? क्योंकि मैंने कभी उसको सताया नहीं था। ऐसा भी नहीं कि पहले कभी सताया हो। इन्हें भी देखती है, हमें भी देखती है। बिस्किट यही लोग डालते हैं, उधर से डाला जाता है। लेकिन मैं गया तो सो गई। मैंने हाथ में लिया, स्प्रे मारा। तुरंत फोन किया कि भैया, दवा लेकर आना, घाव पर मारना है। इसी को कहते हैं सत्कर्म।
लेकिन मुझे इससे मतलब भी नहीं है। मैं बता रहा हूँ। सत्कर्म को मैं पार कर गया हूँ। अब मैं ईमानदार भी नहीं रहा। समझ रहे? अब खत्म हो गया सब मेरी जिंदगी से। उसको हम जानते भी नहीं। वह कहाँ रहती है, क्या उसका नाम है, क्या पता है। बस देखा कि चोट लगी है, मैंने तुरंत मँगवा लिया।
एक बार मैं भँडा गाँव में रहता था। एक काली सी कुतिया थी। जानवरों की समझ मैं बता रहा हूँ। मैं नेरू भाई की दुकान पर बैठा रहता था। कोई भी आए तो मैं बोलता, बिस्किट लो और उसे दो। उसका पेमेंट मैं करता था। जितना होता था मैं कर देता था। बिस्किट लोग देते थे, कभी-कभी हम भी खिला देते। जब मैं निकलूँ तभी वह आए। जब मुझे देखे तभी आए, और मेरे पास आए। उनके पास कभी नहीं जाए। डालने वाले यही लोग हैं, लेकिन कभी वह कुतिया इनके पास खड़ी नहीं हुई। जब आती थी तो मेरे सामने आकर पूँछ हिलाती थी। मैंने देखा, वह कभी उनके पास खड़ी नहीं होती। मतलब उसकी समझ देखी। उसको पता था बिस्किट कहाँ से आता है। सोचिए, जानवर को यह पता था। कई लोग देते थे, किसी के पास नहीं खड़ी होती थी। मतलब उसे पक्का था, यह नहीं देगा। देता तो है, लेकिन बिस्किट यहाँ से आता है, उसे पता था। दुकान पर भी नहीं खड़ी होती थी। किसी के पास नहीं खड़ी होती थी। और जैसे मैं निकलूँ, वह कहीं भी हो, देखते ही दौड़ के आ जाए। बस उसका एक ही काम था, खड़े होकर पूँछ हिलाना, बिस्किट चाहिए।
तो इनमें इतनी समझ होती है। मैंने वही आज महसूस किया कि मैं गया तो सो गई। पहले मैंने कहा, जरा देखना क्या हुआ है उसे। उसकी समझ अद्भुत है। मैं बोल सकता हूँ, अद्भुत है, कि किसी के पास कभी नहीं खड़ी हुई। पकड़ में आने वाली चीज नहीं है। अब मेरे पास आ जाए। जैसे ही मुझे देखे, दौड़ के आ जाए, और पूँछ हिलाने लगे। वह वस्तु का नहीं, करुणा और प्रेम का मामला है। आखिर उसे यह पता था कि यह यहाँ से आता है। यह लोग बस देने के निमित्त हैं। ये लोग नहीं देते। इतना उसे पक्का पता था।
और अगर आप ईमानदारी और सत्कर्म करने के लिए तैयार हो, तो प्रकृति आपको मौका देती रहेगी। अगर आप तैयार हो तो। मूल यही है। और जब आप तुरंत कर सकते हो तो समय क्यों बर्बाद कर रहे हो विधियों में? बताइए। मेरा यह कहना है कि जिस काम को हम तुरंत कर सकते हैं, उसमें समय क्यों बर्बाद करें। ठीक है, फिर विधियाँ करो, उसमें समय दो, होगा कि नहीं होगा। लेकिन यह तुरंत हो सकता है। मैं समझ के करूँ। और तुरंत ईमानदारी और सत्कर्म की शुरुआत कर दें तो हमारी यात्रा होने लगेगी। मैं इतना समय विधियों में क्यों गवाऊँ? आपको क्या लगता है गवाना चाहिए? मुझे तो नहीं लगता। कोई जरूरत नहीं। वह भटकाव है। और भटकाने में लाखों लोग लगे हैं।
अपने आप को गुरु कहते हैं, दुकानें खोले हैं। दुकानदारी है। जिन्हें आज तक बताया गया, कर्म का सिद्धांत बताया गया। पहले महापुरुष कर्म का सिद्धांत बताते थे। और कोई ऐसा व्यक्ति निकलता था जिसे कुछ नहीं चाहिए था। ना कुछ करना है, ना कुछ चाहिए था। तो उसको कुछ पकड़ा देते, जाओ ले, बैठ जाओ। क्योंकि तुम्हें छोड़ने के लिए कुछ तो थमाना पड़ेगा। अब तुम्हें कुछ नहीं चाहिए, लो इसको लो, बैठ जाओ, उपलब्धि हो जाएगी। क्योंकि उसको उन्होंने कुछ नहीं चाहिए के लिए पकड़ा। वह तो कुछ नहीं चाहिए ही है। वहाँ से छूटेगा, इसमें आएगा। और यह तो कुछ नहीं चाहिए, उपलब्धि हो जाएगी। लेकिन कब? जब कुछ नहीं चाहिए। कर्म करते हुए ईमानदारी और सत्कर्म जरूरी है, सबसे जरूरी। समझ रहे?
लेकिन लोग क्या कर रहे हैं? कर्म करते हुए बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हैं, और गुरु से मंत्र ले रखा है। और उस मंत्र से पतन हो रहा है। इतिहास में ज्यादातर देखिए, मंत्र किसको दिया गया? जिन्हें कुछ नहीं चाहिए। पात्रता। कुछ नहीं चाहिए का भाव। ले भैया, कुछ नहीं चाहिए, लेके बैठ। उससे नुकसान ऐसे हो रहा है कि व्यक्ति अपने आप को सांत्वना दे रहा है, कि पाप किए, कुकर्म किए, लेकिन यह कर लिया तो सब माफ हो गया। ऐसा होगा नहीं। माफ कहाँ होगा? वही अपने आप को सांत्वना दे रहे हैं। गुरु घुमा-फिरा के सांत्वना दिला रहा है। आप सीधा बोल रहे हो, थोड़ा। उतना रूखा शब्द नहीं डालना। लेकिन है तो चीटिंग ही, एक तरह से अपने साथ। पैर में चोट लगी है और सिर का इलाज हो रहा है। कहाँ की चोट और कहाँ इलाज। वह तो सड़ेगा। यह भी सड़ने लगेगा। पहले एक घाव था, अब दूसरा तैयार हो रहा है।
कुछ नहीं चाहिए की स्थिति आने के बाद मंत्र देते हैं। वह धारणा, वह पात्रता, कुछ नहीं चाहिए का भाव बन गया था। पात्रता चाहिए। तो उन्हें पकड़ा देते हैं, ताकि वह उसी रास्ते में चल सके। इसलिए पकड़ा देते हैं कि तुम वह सब छोड़ चुके हो। छोड़ने की बात है, छूटा तो नहीं है। लेकिन कुछ पकड़ा देंगे तो वह छूट जाएगा, फिर यह भी छूट जाएगा। यह तो कुछ नहीं चाहिए के लिए पकड़ा है। यह पकड़ा ही नहीं गया। यह बता दिया गया है कि यह पकड़ने से आप अपनी स्थिति में आ जाओगे। तो जैसे वह छूटेगा, यह तो पकड़े नहीं, अपने आप में हो जाओगे। वहाँ से छुड़ाने के लिए पकड़ा दिया। लेकिन किसको? जिसे कुछ नहीं चाहिए। वाल्मीकि हुए, ध्रुव हुए। उन्हें तब दिया गया। पहले समझाया गया, वापस जाओ, वापस जाओ, वापस जाओ, फिर दे दिया। अगर आप देखेंगे तो नारद का मंत्र नहीं था, वाल्मीकि के मुँह से ही बात निकली। उन्होंने राम कहा, उनसे मरा निकला। तो मंत्र किसका था? अब बताइए। मेन भाव की बात है। सारा खेल भाव का है।
मरा-मरा करके पहुँच जाऊँगा। बोले, पहुँच जाओगे, जाओ। क्या भाव। इतना सघन हो गया कि प्रेम की बरसात हो गई। उन्होंने पक्का कर लिया। शब्द कुछ भी रहे। मैं कह रहा हूँ, वह शब्द किसका था? इन्होंने राम दिया, उनसे मरा निकला। उनका तो वही अभ्यास था। बोले मरा-मरा करते जाओ, मरा-मरा से हो जाएगा। तूने पक्का कर लिया है। पक्का हो जाएगा। जाओ, हो जाएगा।
नाम जप से विकार भी हट सकते हैं, अगर कर्म नहीं कर रहे हो तो। अगर कर्म कर रहे हो तो ईमानदारी और सत्कर्म सबसे जरूरी है। बैठ जाओ ना। या तो तुम निकल लोगे, या तो निकल लोगे। हर स्थिति में निकल ही लोगे। यहीं से, कहीं से भी। बस। ऐसा भी कर सकते हो। आपके ऊपर है।
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वीडियो: आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है ? #livesatsang · 2025-03-13