प्रश्नोत्तर P7-0017 · भाग 7
माता-पिता, पत्नी और पुत्र के प्रति जो भाव है, उसे प्रेम कहें या मोह? प्रेम किसको देखता है?
जैसे पिता-माता हैं तो एक आत्मीय स्नेह हुआ। अब वह देखना है। जरूरत तो है स्नेह की। पिता का प्रेम, माता का प्रेम, पुत्र की तरह हमारा प्रेम। उसे प्रेम नहीं बोल सकते। वह मोह आ सकता है। प्रेम नहीं बोल सकते। तो फिर तो सूख जाएँगे ना। माँ से इतना प्रेम था, तो पत्नी आने के बाद पत्नी से ज्यादा और माँ से कम क्यों होता है। हम सबके लिए नहीं बोल सकते, लेकिन ज्यादातर तो यही है। माँ का माँ का ही है, पत्नी का पत्नी का है। लेकिन फिर भी पत्नी आने के बाद जितना हम पत्नी के लिए कर सकते हैं उतना माँ के लिए नहीं कर सकते। जितना अपने बेटे के लिए कर सकते हैं, उतना भाई के लड़के के लिए नहीं कर सकते। अगर प्रेम होता तो किसी के लिए भी कर सकते। यह मोह है। प्रेम नहीं बोल सकते।
जरूरत में तो संबंध है। और उन संबंधों का निर्वाह सृष्टि की व्यवस्था में है। तो एकदम से सूख तो नहीं जाएँगे। जरूरत में जियो।
देखिए, मान लीजिए आपका भाई का लड़का बीमार हो जाए। आपका देने का दायरा एक होगा। लेकिन आपका पुत्र बीमार हो जाए तो सारे दायरे तोड़ दोगे। क्यों। जरूरत वहाँ भी है, जरूरत यहाँ भी है। दायरे वहाँ क्यों नहीं तोड़े, और अपने में क्यों तोड़ रहे हो। मोह है। प्रेम नहीं है।
प्रेम जरूरत देखता है। और जो सामने खड़ा है उसे दे देता है, सब। पहले यही प्रेम की परिभाषा है। वह यह नहीं देखता कि मेरा और तेरा। जरूरत देखता है। प्रेम हमेशा जरूरत देखता है। फिर वह रिश्ते भी नहीं देखता। यह अपूर्व स्थिति है। सिर्फ जरूरत दे। यह सामान्य नहीं है। सामान्य में प्रेम प्रकट ही नहीं हो पाता। हो ही नहीं पाता, जब तक बोध नहीं होता। एकदम नहीं होगा। उसके पहले बस प्रेममय जीवन होगा।
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