प्रश्नोत्तर P7-0073 · भाग 7
किसी को सुधारने के लिए सुधारक को कितनी मेहनत करनी पड़ती है? जब लगता है कि कोई गलत काम कर रहा है, उसका जीवन भी खराब हो रहा है, रिजल्ट नहीं आ रहे, और वो काम अननेसेसरी है, जबकि उसे लगता है कि वो बहुत मेहनत कर रहा है, और हम ऊर्जा और समय देकर सलाह देते हैं, तो वो कह देता है कि सलाह की जरूरत नहीं। वो और बिगड़ जाता है, कई बार लड़ाई हो जाती है। सुधारक का स्वभाव है कि वो बोलता रहता है, पूरा दम लगाता है। उसे खुद कुछ नहीं चाहिए। वो ये देख रहा है कि अगर काम इस ढंग से हो जाए तो बहुत अच्छे रिजल्ट आ जाएंगे, पर सामने वाला समझ नहीं पा रहा। आदत शुरू में किसी कारण से बनी होगी, जैसे उस समय गर्मी हो या ऑफिस जाना हो, इसलिए लगा लिया। पर दो प्रश्न आने चाहिए, मैंने ये क्यों किया, और वो कारण हट जाए तो ये क्यों नहीं हटेगा? जैसे हेमंत खुद गाड़ी चला रहा है, टायर में हवा कम है, ये फील भी हो रहा है, पेट्रोल पंप पर तेल भरवा लिया, और हवा भरवाना भूल गया। जब खुद दिक्कत महसूस हो रही हो, हल भी पता हो, और कोई बता भी रहा हो, तब भी व्यक्ति हल क्यों नहीं करना चाहता? इसका क्या कारण है?
अगर कोई ऐसा करता है, तो वो व्यक्ति लापरवाह होता है। और अगर वो हमेशा अपने साथ यही करता है, तो वो सामने वाले की वैल्यू नहीं करता। ये दो में से एक बात होती है। या तो वो लापरवाह है। उसकी आदत ही ऐसी है कि उसका काम है डांट सुनना और भूल जाना। या फिर वो सामने वाले को वैल्यू नहीं करता। उसकी बात की वैल्यू नहीं करता। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं रहूं या मैं जाऊं। उसे लगता है, अगर कुछ होगा तो मैं निकल लूंगा। मतलब उसे सामने वाले की कोई फिक्र नहीं है। इस स्थिति में व्यक्ति ऐसा करता है।
अब उसकी क्या स्थिति है, वही बता सकता है। और वो तब बताएगा, जब सामने वाला खुलकर उससे बात करेगा। जरा सा भी दबाव नहीं होगा, जरा सा भी संकोच नहीं होगा। तब वो अपनी स्थिति बता देगा। उसके बाद जैसा कर्म होगा, वैसा होगा। अगर वो कह दे कि मैं आपको नहीं जानता, तो समझ लो कि वो आपकी वैल्यू नहीं करता था। वो किसी वजह से, किसी कारण से आपके पास था। जरा सा मौका मिला, और वो निकल गया।
और अगर आपसे प्रेम होगा, तो एक बार नहीं, हजार बार गलती मांगेगा, कि आगे से ऐसा नहीं होगा। अगर प्रेम होगा, लगाव होगा, अगर वो कुछ समझना चाहेगा, कुछ सीखना चाहेगा, तो आप उसे भगाओगे तब भी नहीं जाएगा।
मैं जहां तक समझता हूं, मैं कई सालों से काम कर रहा हूं। आज मैं आपको बता दूं। जैसे समाज में एक सेकंड होता है, वैसे मैंने जीवन का एक पल भी, एक क्षण भी फालतू नहीं गवाया। एक क्षण मैंने कभी फालतू नहीं गवाया। तब जाकर मैं यहां पहुंचा हूं। आप लोग भी देख रहे हो, घूम रहे हो। लोगों की स्थितियां देखो। लोग जिंदगी बिता दे रहे हैं, और उनकी स्थिति देखकर उनको बोलना तक नहीं आ रहा। इसलिए हमें खुलकर बात करनी चाहिए।
जैसे अभी मैं आया। रात है, ठंडा मौसम है। मैंने कहा, टोपी लगाने की क्या जरूरत है। इन्होंने कहा, आदत है। आदत नहीं है। इन्होंने पहले तुरंत झूठ बोला। इस झूठ का इन्हें पता भी नहीं। ऐसा नहीं कि इस व्यक्ति ने मुझसे झूठ बोलने की कोई प्लानिंग की। मुझसे झूठ बोलेगा ही क्यों। लेकिन कहीं न कहीं ये झूठ ही है। फिर मैं इनसे पूछूंगा कि रात में भी टोपी क्यों लगाए हो। वो जवाब अगर पूरी ईमानदारी से दोगे, तो मैं उसमें से बात निकाल लूंगा।
आपने बताया कि बाल पहले उठे हुए नहीं थे। बाल घिस गए, तो अच्छा फील होता था, इसलिए लगा लेते थे। फिर वो रूटीन बन गया। अपनी दुकान है, रात को ग्यारह बजे तक बैठते हो, काफी रोशनी रहती है। कभी ऐसा फील नहीं होता कि अभी रात हो रखी है या दिन हो रखा है। जब लगता है, निकाल लेता हूं। फिर खालीपन सा लगता है, तो उठाकर लगा लेता हूं। यहां दुकान नहीं है, टोपी हाथ में है, तो लगा लेता हूं। एक हैबिट सी बन गई है।
मैं वही कह रहा हूं। कुछ देर पहले आपने कहा कि आदत है। बाद में आपने बताया कि ऐसी स्थिति थी, इसलिए लगाने लगा। ये सही है। ये नेचुरल है। पर हम किसी को धोखे में रखकर इज्जत क्यों पाएं? मैं किसी को धोखे में रखकर खूबसूरत क्यों बनूं? मेरी बात समझ रहे हो? मैं जैसा हूं, वैसा हूं। लोग मुझे कह रहे हैं कि तुम सुंदर हो। लेकिन मुझे तो अपनी कुरूपता का पता है। और वो कुरूपता मान लो कभी सामने आ गई, तो फिर क्या होगा, पता है? फिर आप बहुत गिर जाओगे। इसलिए आप जैसे हो, वैसे रहो। अगर आपको लग रहा है कि इसकी जरूरत मेरे शरीर को है, मुझे है, तब लगाओ। नहीं है, तो मत लगाओ। नहीं तो आप गिर ही रहे हो। आपको समझ में नहीं आ रहा। लेकिन कभी न कभी, जब ये पूरी तरह समाज के सामने आएगा, क्योंकि नया आदमी आपको टोपी में देखेगा, आपके बारे में अपनी फीलिंग बना लेगा, और कभी टोपी निकली, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। भौचक्का रह जाएगा। जैसे हो, वैसे जियो।
आप कह रहे हो कि एक प्रतिशत भी कोई फर्क नहीं पड़ता, कौन क्या सोच रहा था। अभी मैंने बाहर ऐसे ही निकाल दी थी। अगर सोच नहीं रहा था, तो शुरुआत में टोपी क्यों लगाई? लोगों की सोच कही, तभी टोपी पहननी पड़ी। लोगों की सोच की वजह से टोपी पहन ली, और आज कह रहे हो कि मुझे सोच का फर्क नहीं पड़ता। दो जगह खड़े होकर मुझसे बात कर रहे हो। इस बात को ध्यान से समझना। अभी कुछ देर पहले क्या कहा? सीधी बात है, आगे का बाल झड़ गया है, तुझे शर्म आती है। वो समाज की सोच ही तो थी। उसी सोच ने तुम्हें टोपी पहना दी। और आज कह रहे हो कि मुझे सोच का फर्क नहीं पड़ता। अगर सोच का फर्क नहीं पड़ता, तो तुम टोपी पहनते ही नहीं।
हो सकता है हम खुद को स्वीकार न कर पाएं। यहां स्वीकार और अस्वीकार की बात नहीं है, समझने की बात है। आपके स्वीकार या अस्वीकार करने से कुछ होने वाला नहीं है। आप समझिए कि जब आपने शुरुआत में टोपी पहनी, तो किसके लिए पहनी? क्या आपको जरूरत थी? नहीं थी। आपने समाज की सोच की वजह से टोपी पहनी। और आज कह रहे हो कि मुझे समाज की सोच से क्या मतलब। अगर सच में आपकी ये स्थिति होती, जो आप अभी बोल रहे हो, तो आप टोपी पहनते ही नहीं। आप टोपी से मुक्त हो जाइए। मैं यही कहूंगा, ये टोपी आपको बहुत गिरा देगी। इसे साधारण मत समझना। जितने आवरण हैं, उन्हें उतारकर फेंक दो। जैसे हो, वैसे जियो।
मैं जैसा हूं, वैसा मुझे स्वीकार करते हो, तो ठीक है। नहीं करते, तो जाओ। क्या फर्क पड़ता है। आप मुझे देखिए। अभी कुछ देर पहले आपका और मेरा मिलना हुआ। मैं कैसे आया, मैं कहां बैठा, पहले आके मैं कहां गया, इसके बाद मैंने कैसे स्नान किया, और कैसे आपके सामने खड़ा हूं। आप मेरे काम के लिए आए हो। ये मेरा व्यक्तिगत जीवन है। मैं कैसे नहाऊं, मैं कहां बैठूं, मैं किसके साथ खेलूं, ये मेरी लाइफ है। आप जिस काम के लिए आए हो, जब हम उस काम की बात करेंगे, तो उस काम में मैं आपको मार्ग बताऊंगा। मेरे कपड़े देख लो, मेरा पहनावा देख लो। मैं जैसा हूं, वैसा स्वीकार करो, तो ठीक है। नहीं, तो जाओ।
जरूरत में वस्तुओं का उपयोग करो। अगर आप किसी को प्रभावित करने के लिए, किसी के दबाव में, किसी के संकोच में, इज्जत पाने के लिए करोगे, तो आप गिर जाओगे। मुझे क्या फर्क पड़ता है कि आप टोपी लगाओ या न लगाओ। लेकिन ये टोपी आपको बहुत गिरा देगी, ये बात मुझे मालूम है। और जब आप इसे अपने अंदर से हटा दोगे, तब आपको खुद पता चलेगा कि आप कितने दबे हुए थे। अभी तो बाहर से हमारी और आपकी बात हो रही है। अभी आप समझने का प्रयास कर रहे हो। जिस दिन ये टोपी आपके अंदर से हटेगी, उस दिन देखना, आप कितना खुला महसूस करोगे। ऐसे ही दबाव और संकोच में, लोगों को आकर्षित करने के लिए, व्यक्ति अपनी जिंदगी को नर्क कर देता है। लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी लाइफ को नाश कर देता है। पूरी तरह नर्क बना देता है।
आप देखो, मैं किसी में नहीं लगता। न गृहस्थ में लगता हूं, न इसमें लगता हूं। मैं किसी से कुछ बोलता ही नहीं। मैं बस अपना काम करता हूं। आप मेरे साथ आदिवासी क्षेत्र में घूमे। देखा, कैसे लोग बात करते थे। भीड़ के चक्कर में हम अपनी जिंदगी क्यों नष्ट करें। भीड़ का सोचने का क्या पैमाना है। वो हमें कैसे स्वीकार करें। वो करें या न करें। आपने कहा कि मुझे सोच का क्या फर्क पड़ता है। काश तुम इसमें जीते। काश तुम सच में इसमें जीते, तो तुम्हारा अस्तर बहुत ऊंचा चला जाता। आप कह तो दिए, पर जी कहीं और रहे।
इसलिए जितने आवरण आपने लोगों को आकर्षित करने के लिए, लोगों को प्रभावित करने के लिए लगाए हैं, उनको फेंक दो। और जैसे हो, वैसे जीओ। मर्यादा जरूर रखो। मर्यादा बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं कि हम किसी का अपमान करने लगें। हमें जिंदगी जीने के लिए मिली है। जीवन जीने के दो रास्ते हैं। एक ईमानदारी और सत्कर्म। दूसरा बेईमानी और दुष्कर्म। आप चुनाव करिए। ईमानदारी और सत्कर्म में आप अकेले हो। बेईमानी और दुष्कर्म में झुंड है। और जहां झुंड है, वहां अशांति है। सीधी बात है। और जहां आप अकेले हो, वहां आनंद है। अब आप देख लो, किसमें रहना चाहते हो। ये आपके ऊपर है। सबके ऊपर है। इसमें मैं भी आता हूं, आप भी आते हो, सब आते हैं। ये आपको देखना है।
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वीडियो: किसी को सुधारने के लिए सुधारक को कितनी मेहनत करनी पड़ती हैं ? #yogiji_ka_satsang · 2025-06-27