प्रश्नोत्तर P7-0077 · भाग 7
टोपी वाली बात समझ में आ रही है। हो सकता है मेरी मानसिकता शुरू से ऐसी रही हो। घर पर भी खालीपन और अधूरापन लगता है, तो लगा लेता हूं। अब ऐसा नहीं कि लोग मुझे अच्छा समझेंगे। शुरुआत वही पहली भावना से हुई थी, और अब आदत बन गई है। वो पहला भाव छूटता नहीं। जब साथ में टोकने वाला नहीं रहेगा, और समाज के पास हर बात का जवाब देने का समय नहीं है, तो इस आदत से कैसे निकलें?
मैं तो बस आपको इतना कहूंगा। जब आपको लगे, जरूरत है, तो लगाना। लेकिन अपने आपको जवाब देना। मैं वहां रहकर टोकने वाला नहीं रहूंगा। और समाज के पास इतना समय नहीं है कि आपकी किस-किस बात पर, कैसे-कैसे जवाब देता रहे।
अगर आपको लगे कि जरूरत है, तो लगाना। लेकिन अपने आप को जवाब देना। जरूरत हो, तभी लगाना। आदत में नहीं। ये मेरी तरफ से आपके लिए सलाह है। ये बहुत अच्छी बात है। जब आपने बाद में डिटेल से बताया, तो बात समझ में आई। चीजें फील होती हैं। चार लोग हैं, तो लगा ही लेते हैं। मैं वही कह रहा हूं।
बस अपने आप को जवाब देना। जरूरत में लगाना, आदत में नहीं। फिर आप देखना। धीरे-धीरे, जब ये पूरी तरह आपके अंदर से निकलेगा, तो आप बहुत खुलापन महसूस करोगे। काम बस इतना है। जब भी लगाना हो, तो अपने आप से प्रश्न करना। क्या जरूरत है। धूप लग रही है, तो लगा दूंगा। नहीं तो नहीं।
जब आप इससे निकलोगे, तो बहुत खुलापन पाओगे। क्योंकि मैं ये समझ पा रहा हूं। मैं इन्हीं सब पर काम करता हूं, सोचने के लिए। जब भी रखना हो, तो अपने आप से प्रश्न करना कि क्या जरूरत है। जरूरत हो तो लगाना, नहीं तो मत लगाना। बात खत्म। इसमें बस इतना ही काम करना है। इससे ज्यादा नहीं।
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