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प्रश्नोत्तर P7-0080 · भाग 7

अच्छा कर्म करना है, ऐसा कहा गया। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है, ये बात समझ में आ रही है। लेकिन धर्म और अधर्म क्या होता है? रास्ते में किसी को खाना दे दिया, तो धर्म लग रहा है। अनदेखा कर दिया, तो अधर्म। अगर उसे अच्छा या बुरा मान लिया, तो अटैचमेंट हो जाएगा, फिर मोह हो जाएगा। क्या उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न अच्छा मानें न बुरा, ताकि फंसें नहीं? भाव ये है कि अच्छा-अच्छा कहते हुए मैं भोग में न फंस जाऊं। मुझे मुक्ति का मार्ग चाहिए, बंधन नहीं। मैं मानवता और कर्तव्य से काम करूं, पर अच्छा कहकर वहीं न अटक जाऊं।

भाई ने कहा, अच्छा कर्म करना है। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है। जब आप किसी की भावनाओं को समझते हो, उसे सही रास्ता बताते हो, तो अच्छा कर्म होता है। और आप बिना मतलब किसी को सताते हो, भटकाते हो, तो बुरा कर्म होता है। आप सही कह रहे हो। धर्म और अधर्म क्या होता है। आप कह रहे हो, हम रास्ते जा रहे हैं। दो खरीदारी हुई, तो आपको लगा कि इनको खाना दे दो। आपने खाना दे दिया, ये धर्म में आ गया। और आपने इनको अनदेखा कर दिया, ये अधर्म में आ गया। अगर हम उसे अच्छा या बुरा मान लेंगे, तो अटैचमेंट हो जाएगा। उसे हमें अपना कर्तव्य मानना चाहिए। मैं गलत भी हो सकता हूं, सही भी। हमें अपना कर्तव्य मानकर काम करना चाहिए। अगर अटैचमेंट हो गया, फिर मोह हो जाएगा। मोह हो गया, फिर हम यहीं रह जाएंगे। उससे निकलने के लिए कर्म से अटैचमेंट खत्म करना पड़ेगा। उसे न अच्छा मानो, न बुरा। ये मेरा धर्म ही है। ध्यान से समझो। आप कह रहे हो, जब आप किसी की सहायता करते हो, तो ये धर्म है। जब आप किसी को सताते हो, तो ये अधर्म है। लेकिन उसी को सामान्य भाषा में अच्छा और बुरा ही बोला जाता है। भाषा में हर समय वही शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब कहोगे, मेरे से मुक्त हो जाओ। और बस में जा रहे हो, ट्रेन में जा रहे हो। किसका उपयोग है, तो कहोगे क्या। वहां मेरे का उपयोग करना पड़ेगा। लोग कहते हैं, मैं का उपयोग मत करो। मैं को मैं नहीं कहोगे। लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसी भाषाओं का उपयोग जीवन जीने के लिए करना पड़ता है। अच्छा करने दो। प्रसन्नता होती है, आज अच्छा कर्म कर दिया, किसी को खाना खिला दिया, किसी के जन्म पर। किया। फंस गया क्या। नहीं। ऐसा लगता है कि फंस गया। तुमने किया, तभी बोल रहा है। कम से कम शुरुआत तो हुई, कहीं से। वो फंसा तो है ही। अब निकलना चाहता है। अभी फंस नहीं गया। वो फंसा है ही। इसलिए तो अच्छा कर्म करना पड़ रहा है। अगर फंसा नहीं होता, तो अच्छा कर्म करने की जरूरत नहीं थी। अब वो निकल रहा है। बिल्कुल। शुरुआत तो कर रहा है। देखो, पिंजरा लोहे का हो या सोने का। पिंजरा पिंजरा होता है। लेकिन सोने के पिंजरे की कीमत अलग मिलेगी, लोहे की अलग। अगर एक जगह उसका उपयोग वैभव के लिए किया जाए, तो क्या दोनों पिंजरों का एक ही रेट मिलेगा? उसके लिए तो पिंजरा पिंजरा है। मैं वही कह रहा हूं। पिंजरा पिंजरा है। लेकिन हम उस पिंजरे का उपयोग कहीं और कर देंगे, तो पिंजरे में एक ताकत है। लोहे के पिंजरे में अलग ताकत है। सोने के पिंजरे में अलग ताकत है। मेरी बात समझ रहे हो। पिंजरा पिंजरा है, लेकिन ताकत अलग है। तुम भी मानो, तुम भी मानो। क्या दोनों की एक ही ताकत है? दोनों का एक ही वैल्यूएशन है, इस संसार में? अगर एक ही होता, पिंजरा लोहे का हो या सोने का, तो राम और कृष्ण क्यों पूजनीय हैं, और बाकी मनुष्य क्यों नहीं? ये बताओ। कितने महात्मा हुए, वो पूजनीय हैं। वही शरीर, वही खून, मांस, मज्जा तुम्हारे मां-बाप में भी है। वो क्यों पूजनीय नहीं होते। जरा बताओ। अब इसे ध्यान से समझिए। मान लो, एक बालक ने पढ़ने की शुरुआत की। और एक बालक को किताब पढ़ना आ गया। एक चिल्लाकर बोल रहा है, क से कबूतर। तो दूसरा कह रहा है, कबूतर पढ़ने की अब तुझे जरूरत नहीं। छोड़। अब तू किताब पढ़। लेकिन उसे क से कबूतर से ही शुरुआत करनी पड़ेगी। जिस दिन वो किताब पढ़ना चालू करेगा, वो कबूतर को भी छोड़ देगा, और क को भी छोड़ देगा। वो सीधा किताब पढ़ लेगा। शुरुआत में अच्छे और बुरे का उपयोग करना ही पड़ता है। शुरुआत यहीं से होती है। शुरुआत सीधे धर्म से करोगे, तो एक आदत बन जाएगी, एक नाटक बन जाएगा। शुरुआत आपको क से ही करनी पड़ेगी। और बाद में क भी छूट जाएगा, कबूतर भी छूट जाएगा। आप सीधा पढ़ोगे। फिर आप पढ़ते हो। अगर कुछ लिखा हुआ है, तो आप ये नहीं बोलोगे, क से कबूतर, ख से खरगोश। सीधा पढ़ोगे। लेकिन जब शुरुआत करनी पड़ती है, तो हमें ये करना पड़ता है। सामान्य व्यक्ति तो अच्छा करता है। अब वो छूटता चला जाएगा। जब करते रहोगे, तो अपने आप छूटता जाएगा। जैसे क छूट गया, कबूतर छूट गया। अब आप एक बात बताइए। मान लो कमल पढ़ना है। क्या आप पढ़ते हो, क से कबूतर, म से महल, ल से लड्डू? ऐसे पढ़ते हो क्या? सीधा कमल पढ़ देते हो। क भी नहीं पढ़ते कि क है, म है, ल है। लेकिन जब शुरुआत की थी, तो तुम यही कहते थे, याद करने के लिए, क से कबूतर। जब मिलावट के अक्षर पढ़ने लगे, तो सीधा कमल पढ़ दे रहे हो। आप ऐसा भी नहीं कर रहे कि ये क है, ये म है, ये ल है। क्योंकि तब कमल बन नहीं पाएगा। हां, ये तरीका है। तो शुरुआत में ठीक है। आपको समझ में आ गया, तो आप लिख लो। लेकिन किसी को रोको मत। वो अभी कम है। तो उसे पढ़ने दो। वो अच्छा कर्म कर रहा है, करने दो। अब उसे कर्तव्य कहोगे, तो उसे कर्तव्य समझ में नहीं आ रहा। तुम कहोगे, कर्तव्य अपने परिवार के लिए करना है, किसी के लिए नहीं। वो जाल में फंस जाएगा। और जब उससे कहोगे, बेटा, अच्छा कर्म करो, तो वो सबके साथ करेगा। और तुम कहोगे, कर्तव्य करो, तो वो अपने परिवार के जाल में फंस जाएगा। क्योंकि मेरा कर्तव्य इतना ही है। मेरी बात समझ पा रहे हो। कर्तव्य एक दायरे में बांध देता है। और अच्छा कर्म, बुरा कर्म, ये पूरे विश्व के लिए कर सकते हो। सही बात है। आप कर्तव्य की बात कर रहे हो। अभी आपका कर्तव्य क्या है, बताइए। किसी के लिए? कर्तव्य कहां से ला रहे हो। यही तो है। यही बांट दिया, तुरंत। इस चीज के लिए कर्तव्य तो नहीं। हम लोगों को समझ में आ रहा है। आप सही कह रहे हो। लेकिन समाज के लिए कितना कर्तव्य है। रास्ते में हुए, फिर आपने समाज को अलग कर दिया। यही बात है, बांट दिया। जब मैं कहूंगा, अच्छा कर्म करो, तब आप ये नहीं पूछोगे कि किसके लिए। कर्म में सब आते हैं। कर्तव्य की बात समझ रहे हो। कर्तव्य शब्द एक दायरा है। कर्तव्य शब्द का एक दायरा है। लेकिन अच्छे कर्म का दायरा नहीं है। जब आपसे कहा जाएगा, बेटा, अच्छे कर्म करो, तो उसका दायरा नहीं है। दायरे से परे का शब्द है। और जब आप कहोगे, कर्तव्य करना है, तो कर्तव्य में कितने लोग आते हैं। मेरा परिवार? सुनने में ही पार्टीशन हो रहा है। वही बात। जैसे पूछा, किसके प्रति बताएं। कर्तव्य मेरी फैमिली के लिए है, या समाज के लिए। जैसे हम सड़क से जा रहे हैं। हमें लगा, कोई घायल पड़ा है। हमने उसका इलाज कराया। उसको हम अच्छा कर्म मानेंगे, या अपना इंसानी कर्तव्य मानेंगे। इंसानी कर्म मानेंगे, ऐसा नहीं। ये अच्छा कर्म है। नए के लिए, जिसकी समझ में नहीं आया, उसके लिए। या जिसको समझ में आता है कि इंसान का धर्म इतना है, मानव का धर्म एक-दूसरे की सहायता करना है। वहां कर्तव्य शब्द इस्तेमाल नहीं होगा। वहां मानवता शब्द इस्तेमाल होगा। आपके अंदर मानवता होनी चाहिए। एक-दूसरे के दुख-सुख को समझने के लिए। जब जरूरत पड़े, तो एक-दूसरे की सहायता करो। हम एक-दूसरे के पूरक हैं। वहां कर्तव्य शब्द नहीं होगा। मेरे कहने का तरीका अगर कर्तव्य कहे, तो गलत तरीका होगा।

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