प्रश्नोत्तर P7-0104 · भाग 7
मैं शिक्षक रही, बाहर से जीवन में कमी नहीं रही। अब बहू बेटे को देखती हूं। उनकी जिंदगी अच्छी है, पर कंप्रोमाइज बहुत कम है। हमने नीचे से मेहनत की, उन्हें बिना मेहनत सब मिल गया। क्या करें? बहू कहती है हम भी चलेंगे। उन्हें यहां लाना चाहिए था क्या? घर पर समय कैसे दें, जब बात नहीं सुनते और दूरियां बढ़ जाती हैं?
आप बढ़िया जीवन जियीं, शिक्षक रहीं। बाहर से जीवन में कोई कमी नहीं रही। अब बहू बेटे को देखती हो। जिस तरीके से वह जीते हैं, आप उस तरीके से अब भी साथ में जी सकती हो। शौक है तो अपनी समझ से पूरा कर लो। ऐसा न हो कि शौक दबा का दबा रह जाए।
उनमें कंप्रोमाइज कम है, और आप में ज्यादा रहा, क्योंकि आप दोनों ने मेहनत की। उन्हें बिना मेहनत सब कुछ मिल गया। आपने मेहनत की, और उनको बिना मेहनत सब हाथ लग गया। वह कंप्रोमाइज क्यों करेंगे? उन्होंने दुख नहीं देखा, तकलीफ नहीं देखी। कंप्रोमाइज कैसे करेगा व्यक्ति? आपने इसलिए किया कि नीचे से शुरुआत की। नीचे से शुरुआत करने वाला कंप्रोमाइज करता है। जो कई रात भूखा सोया है, उसे एक दिन कहो भोजन नहीं है, तो आराम से सो जाएगा। जो कभी भूखा नहीं सोया, उसे एक दिन कहो भोजन नहीं है, वह पूरा हंगामा कर देगा। क्योंकि उसने तकलीफ झेली नहीं। आपके बच्चों के साथ यही रहा। उन्होंने वह स्थिति देखी नहीं, इसलिए कंप्रोमाइज नहीं करेंगे। सब मिल गया, कंप्रोमाइज क्यों करें? अभाव देखा नहीं उन्होंने। आप दोनों बनाने में लगे। उन्हें बनाना नहीं था। बना बनाया मिला, तो कंप्रोमाइज क्यों करेंगे? वह कंप्रोमाइज नहीं करेंगे।
क्या करना चाहिए? उनको आपने ताकत दे दी। अब समझ देने की जरूरत है। या ताकत छीन लो। कुछ दिन छोड़ो, फिर देखो, समझ में आ जाएगा। सुधारने के लिए इतना त्याग, इतनी हिम्मत हो तो करो। ताकत कम होगी तभी व्यक्ति समझेगा। समझ भी क्यों लेगा? उनको समझ चाहिए, ज्ञान चाहिए, संस्कार चाहिए। इसके लिए प्रयास करोगी तो होगा। क्यों नहीं होगा?
बहू कहती है हम भी चलेंगे। बहू को लाना चाहिए था। ऐसी जगह कुछ दिन छोड़ देना चाहिए। एक आध हफ्ता, एक महीना। समय तो देना पड़ेगा। किसी के जीवन में बदलाव करना है, तो जैसे एक बीज को वृक्ष बनाना हो तो जमीन में डालना पड़ता है। वैसे ही सुधारना है, बदलना है, तो ऐसी जगह ले जाओगे तभी होगा। ऐसे नहीं होगा। वह अपनी समझ से जितना समझना था, समझ के कर ही रहे हैं। अब समझ विकसित करनी है, तो जहां समझ का स्तर उठे, वहां ले जाकर रखो। समय देना पड़ेगा। जहां लगे कि यहां से समझ उठेगी, वह सत्संग सुनाओ, वहां ले जाओ। धीरे धीरे बदलाव होगा। पर आपको लगना पड़ेगा। एक में बदलाव आया तो दूसरे में आ जाएगा। बहू पूरी तरह समझ गई, तो लड़का भी समझ जाएगा, क्योंकि उसे जवाब नहीं मिलेगा, वह प्रक्रिया नहीं मिलेगी। सरलता से वह भी समझ जाएगा। लाना चाहिए था। कभी ऐसा हो तो बच्चे को भी लाना। सत्संग सुनाना।
मोबाइल पर स्पीकर लगा लो। रोज एक दो घंटे, सुबह शाम, पूरे घर में आवाज हो। न सुनना चाहें तब भी शब्द कान में पड़ेगा। शब्द अपना काम करेगा। यह ध्यान रखना। स्पीकर लगाओ, एक दो घंटा सुनाओ। देखना, बदलाव कैसे नहीं होगा। कान में शब्द पड़ेगा, न चाह के भी सुनना पड़ेगा। शब्द बदलाव करेंगे। सुनेंगे तो समझना पड़ेगा। समझ गए तो और सुनेंगे।
आप घर पर समय देने को कहती हो, इसी समझ के लिए। सत्संग सुनाइए। कहीं न कहीं वह अपसेट होते होंगे, इसलिए समय नहीं दे पाते, क्योंकि उनकी बात कोई नहीं सुनता। यह भी बात है। समझो। व्यक्ति दूर कब जाता है? जब वह समझाना चाहता है और बच्चे नहीं समझ रहे होते हैं, तो चला जाता है। कितना प्रयास करे? अब उनके अपने बच्चे हो गए। एक बार में, दो बार में समझना चाहिए। तीसरी बार न समझे, तो ऐसे व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। कितना पीछे पड़ोगे? बच्चा सुनता है। बहू भी सुनेगी। ऐसा नहीं है। समझ के समझाइए। सत्संग सुनाइए। जीवन में आएगा।
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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03