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प्रश्नोत्तर P7-0143 · भाग 7

संत कबीर दास, दादू दयाल और गुरु नानक ने कहा है कि अपने जीवन में जीते जी मरना चाहिए। साधक के लिए जीते जी मरना क्या है?

साधक के लिए जैसे मुर्दे की कोई इच्छा नहीं होती, कोई कामना नहीं होती। जब आप इस मार्ग में निकल गए, तो अपने आप को जीते जी मरा समझो। जब हम इस मार्ग को समझ गए, तो हमें अपने आप को मरा समझना चाहिए। मरा होने का मतलब है कि पीछे नहीं जाता। मरा हुआ व्यक्ति पीछे नहीं जाता, वह सिर्फ आगे जाता है। इसी को कहते हैं अपने आप को मरा समझना। जीते जी अपने आप को मरा समझ लो। मरा इसलिए समझ लो, कि मरे हुए व्यक्ति की कोई कामना नहीं होती। एक मरा हुआ व्यक्ति हो, उसके सामने सारा भोग रख दो, वह करेगा क्या? तो अपने आप को इस मार्ग में मरा हुआ समझ लो, तब आप आगे निकल जाओगे। और मरा हुआ नहीं समझोगे, तो अपने सारे पिछले संबंध निभाते रहोगे, और उसी में फंसते रहोगे, आगे जा ही नहीं पाओगे। जीते जी मरना मतलब अपने आप को इस समझ से देखना, कि भैया मैं मर गया, अब इस मार्ग में जा रहा हूं। मेरी कोई कामना नहीं है। अब मैं कोई भी वासना, कामना, यह सब त्याग करता हूं। मैं कोई बेईमानी नहीं करूंगा। बस मैं इसी मार्ग पर चलूंगा, जिस मार्ग के लिए मैं निकला हूं।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 12 अप्रैल 2026, अपनों की कुटिया में सत्संग समझो #योगी · 2026-04-12