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प्रश्नोत्तर P7-0194 · भाग 7

एक श्रोता ने कहा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को हिंदू धर्म में निराशा हाथ लगी, इसलिए वे दूसरे धर्म में गए। गुरु जी, आप अंबेडकर का प्रसंग किस बात के लिए लाए थे?

यह अभी मैं कुछ देर पहले बात किया था ना, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का। तो मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं धर्म की बात ही नहीं कर रहा हूं, कि उन्हें हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म। मैं कह रहा हूं कि वो भी तो गए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए किसी धर्म को अपनाया। मेरा कहना यह है कि इतना पढ़ने-लिखने के बाद, इतना विदेश जाकर पढ़े, इतनी योग्यता होने के बाद भी अपने आत्मिक कल्याण के लिए किसी धर्म को तो अपनाया। किसी महापुरुष के शरण में, सानिध्य में तो गए। मैं यह कहना चाहता हूं। मैं यही कहना चाहता हूं कि संविधान से देश चलता है। आत्मिक कल्याण संविधान से नहीं होता। आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के सानिध्य में जाना पड़ेगा। मैं यह कहना चाहता हूं। आप लोग इस बात को समझो। बात यह नहीं कि वो किस धर्म में गए, कहां गए। कहीं तो गए। तो मैं यही तो कह रहा हूं कि आप लोग भी अपना आत्मिक कल्याण जहां आपको लगता है कर लो। मैं थोड़ी ना कह रहा हूं कि आप ये धर्म अपनाओ, ये धर्म अपनाओ। अरे, धर्म क्या है? परोपकार धर्म है। जहां मेरे आत्मिक कल्याण का मार्ग बताया जाए, वही धर्म है। धर्म क्या है? जो नहीं कर रहा है वो कौन सा धर्म है? वो भी तो वैसे ही है। करने से धर्म हो जाता है। मेरा यह कहना है कि वो गए ना अपने आत्मिक कल्याण के लिए। मैं यह कहना चाहता हूं। आप यह बात समझने का प्रयास करिए। अरे भाई, बुद्ध शासन चलाने के अधिकारी थे। वो भी भिक्षुक बनके अपने आत्मिक कल्याण के लिए गए ना। कितने सालों तक जाकर तपस्या की, कितने गुरुओं का शरण लिया। वो भी तो गए। कोई भी, किसी का भी नाम ले लो। स्वामी विवेकानंद इतने पढ़े-लिखे। अब रामकृष्ण परमहंस उनके सामने तो अनपढ़ ही थे, स्वामी विवेकानंद के सामने। लेकिन अब रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानंद को शिक्षा दी। बताइए, अब उनकी बाहरी शिक्षा रामकृष्ण परमहंस के सामने रही क्या? वो तो जिस पेज को ऐसे देखते थे, स्कैन कर लेते थे। उनको लाइन पढ़नी थोड़ी पड़ती थी। स्वामी विवेकानंद को पेज ऐसे देखना पड़ता था। वो तो जिस पेज को ऐसे देखते थे, स्कैन कर लेते थे, जैसे आपका मोबाइल स्कैन कर लेता है। एक जगह तो था कि किसी ने कई किताबें दीं, तो उन्होंने ऐसे पलट के कहा, मुझे सब याद हो गया। सामने वाला आश्चर्यचकित हो गया। बोले, इतनी किताबें तुम पढ़ लिए? उन्होंने पेज पूछा, इस पेज पर क्या लिखा है? तो उन्होंने पेज सही-सही बता दिया। तो आप बताइए, इतना पढ़ा-लिखा विद्वान व्यक्ति, बाहर के लिए, वो किसके पास जाता है? रामकृष्ण परमहंस के शरण में जाता है, और वह उन्हें पढ़ाते हैं। अब आप समझिए कि रामकृष्ण परमहंस ने फिर कौन पढ़ाई पढ़ी? बाहरी पढ़ाई तो नहीं। बाहरी पढ़ाई में तो स्वामी विवेकानंद से आगे वो नहीं थे। लेकिन बहुत आगे थे, कि स्वामी विवेकानंद समर्पण कर देते हैं और फिर उनसे सीखते हैं। स्वामी विवेकानंद को कई वर्ष लगे रामकृष्ण परमहंस के शरण में रहकर। एक दिन में थोड़ी ना ज्ञान उनको हो गया। उन्होंने कुछ आत्मानुभूति कराई थी, अपनी शक्ति के द्वारा, कुछ करा दिया था। लेकिन उनको उस स्थिति में होने के लिए कई वर्ष साधना करवाया। एक-दो दिन में थोड़ी ना हो गया। भाई, गुरु के पास आप जाते हो तो कुछ झलक दिखा देता है, अपने तरीके से। अगर कोई उसे गुरुभाव से स्वीकार करता है, तो चाहे उसके पास हो, चाहे नहीं हो, आपको कुछ झलक दिखा देगा। झलक क्यों दिखा देगा? कि तुम अपने आत्मिक कल्याण में लग जाओ। इसलिए झलक दिखाता है तुम्हारे लिए, कि तुम्हारा भरोसा थोड़ा मजबूत हो जाए। लेकिन आत्मिक कल्याण में कई वर्ष लगेंगे, जैसा आपका कर्म होगा। लेकिन मेरा कहना है भाई, लग जाओ पूरी तरह। अगर आप लग गए तो कभी ना कभी तो होगा। लग जाओ। तो मेरा यही कहना है कि आत्मिक कल्याण के लिए किसी जीवंत गुरु के शरण में जाओ और करो अपना आत्मिक कल्याण। और मैं यह काम कर रहा हूं मानव समाज के लिए। ना कि मैं हिंदू धर्म के लिए कर रहा हूं। ना तो मैं मुस्लिम धर्म के लिए कर रहा हूं। ना तो मैं सिख धर्म के लिए कर रहा हूं। ना मैं ईसाई धर्म के लिए कर रहा हूं। मैं उन लोगों के लिए काम कर रहा हूं जो लोग अपना आत्मिक कल्याण चाहते हैं। मुझे किसी धर्म से मतलब ही नहीं है। मेरा कोई धर्म का ठप्पा ही नहीं है। मैं किसी समूह, किसी समुदाय, किसी पंथ, किसी मजहब के लिए काम नहीं कर रहा हूं। मैं मानव का उद्धार कैसे हो जाए। मैं प्रत्यक्ष ज्ञान ले आया हूं। तो इस ज्ञान का कोई भी उपयोग कर सकता है। तो मेरा यही कहना था कि वह कहीं ना कहीं तो गए। मैं यह बताना चाहता हूं कि इतने पढ़े-लिखे भी लोग कहीं ना कहीं अपने आत्मिक कल्याण के लिए गए। उनके पास क्या कमी थी, बताइए? बुद्ध के पास, स्वामी विवेकानंद के पास। ये सब शिक्षित में भी शिक्षित, एकदम ऊपर के थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी। क्या कमी थी इनकी जिंदगी में? क्या कोई कमी थी? गए ना अपने आत्मिक कल्याण के लिए। इस बात को जरा समझो। आप अपना उद्धार चाहते हो तो किसी जीवंत गुरु के शरण में जाकर, सानिध्य में रहना पड़ेगा, तभी होगा। नहीं तो ऐसे ही कभी देवता, कभी राक्षस, फिर कभी पशु बनके जीते रहो।

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