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प्रश्नोत्तर P9-0089 · भाग 9

क्या असीमता ही हमारा मूल स्वभाव है?

हां, भैया। या तो दरिद्र की जबान पर पैसा रहता है, या तो बैंक में। तो हम असीमित बोलते हैं। नहीं तो वह हमारा स्वभाव थोड़ी हो गया। हम कम थोड़ी न बोलते। अपने-अपने अधिकार में थोड़ी न रहते हैं। हम हमेशा वह बातें करते हैं, जिस लायक हमारी पीढ़ियां भी नहीं हैं। बाबू-दादा भी न रहे हों, और हम बात कर रहे हैं अनलिमिटेड। जैसे कुछ दोस्त रहे। कहानी सुनी हो, तो बहुत बड़ा-बड़ा कह के रहे। एक जन कहे कि हमारे पिताजी के पास ऐसी ऐंठ है कि आसमान में मकड़ी का जाला हटाते हैं। तो दूसरा कहे कि वह हमारे घर में रखा है। बाबू हो, तो तेरे बाबू के पास यह बात थोड़ी न। तुम्हारे पास जगह नहीं थी, लेकिन तेरे बाबू के पास जगह न रही रखने को, तो तू हमारे दलान में रखे का। समझे, भैया? असीमित हमारी सोच है। हम हमेशा अपने औकात से ज्यादा ही सोच के परेशान हैं, ग्रसित हैं। ऐसे बहुत हां वाले हैं। और एक जन बैठा रहा, आगे भी कहानी बढ़ा दी। बोला, वह हमारा-तुम्हारा बाबू का घर हमारे बाबू ने बनाया है। और मिस्त्री नहीं मिल रहा, कि वैसा कारीगर ही दुनिया में नहीं था। घर बनाने वाला आखिरी ही था। तो बोला, वह घर मेरे पिताजी ने बनाया। तीनों के तीनों नहीं। तीनों में से पिताजी है ही नहीं। अब तुम देखो कि तुम कौन हो, तीनों में से। तुम इतना बड़ा काम वाले हो। इतना बड़ा काम जिसने किया, वह रुकेगा क्या? वह तो आसमान पार कर दिया। अपना सब दादा-बाबू। ऐसे कुछ लड़कियां नदी किनारे बैठी रहीं। जो हमारा बाबू पानी में गए, तो एक मिनट, दो मिनट, ऐसे सब बढ़ावा चल गया। एक मिला, हमारा बाबू गए, आज तक नहीं लौटे। डूब गए? मतलब आज तक लौटे नहीं। अभी तक वही हैं, पानी में। इतनी सांस रोकने की क्षमता है। रुके बैठे हैं, आज तक आए ही नहीं, लौटे ही नहीं। उसी में रह गए। मर लिए? तो कहां मर लिया। लाश मिले तब न, मर गए। प्रमाण क्या है मरने का? बाबू गए, डूबे, और निकले नहीं, तो प्रमाण तो नहीं है न। अब तक वही हैं। बचपन में ऐसा ही होता था। हम लोग ऐसे हैं। दुनिया में कभी भी अपनी क्षमता के अनुसार ही बात करनी चाहिए।

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वीडियो: लाइव के प्रश्न और उत्तर अपना स्वयं का कल्याण कैसे करें ? #योगी · 2026-06-06