JY-0016 · आरंभ
बचपन से संन्यास तक — कामाख्या की इच्छा, व्यापार, ज्योतिष और मलाड का आश्रम
15 जून 2026 · हर मोड़ पर बदलाव है, वही तो ज़िंदगी है · 1:11 से
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मुख्य बातें
- बचपन से कामाख्या की तंत्र विद्या के बारे में सुनते थे, वहां जाने की इच्छा थी; समाज के लिए कुछ करने का जज्बा था।
- जो भी मिलता, बांटने से पहले खुद पर परखते — कई बार दवा के प्रयोग से खुद बीमार भी पड़े।
- व्यापार किया, ज्योतिष किया — नाम, शोहरत, पैसा से भर गए; फिर मलाड के उदासीन आश्रम में संन्यास के वस्त्र धारण किए और तीसरे दिन आश्रम छोड़ दिया।
बचपन
पहले मैं बचपन में तंत्र विद्या के बारे में बहुत सुनता था कि ऐसे होता है, ऐसे होता है — कामाख्या में आदमी को कुछ भी बना देते हैं, तोते बना देते हैं। कामाख्या गुवाहाटी में है। तो मेरी बचपन से वहां जाने की इच्छा थी, कि वहां तंत्र विद्याएं होती हैं और उनके द्वारा कुछ भी कर सकते हो। यह बचपन से सुना था, और कुछ करने का जज्बात भी अंदर था कि मुझे कुछ करना है, चाहे जैसे भी — समाज के लिए।
मेरे पास कुछ भी आता था तो मैं लोगों में बांट देता था। लेकिन बांटने के पहले उसका उपयोग मैं खुद कर लेता था, उसका टेस्ट पहले मैं लेता था — चाहे कोई दवा हो, कुछ भी हो। कई बार मैं बीमार भी पड़ा; उस दवा का प्रयोग मैंने किया और मेरे शरीर को बहुत तकलीफ हो गई, तो मैंने उस दवा को आगे नहीं बढ़ाया।
बचपन से जब मैं नर्क-स्वर्ग के बारे में सुनता था तो कहता था — भगवान, अगर मैं मरूं तो मुझे नर्क देना, क्योंकि स्वर्ग में तो सब सुखी, संपन्न रहेंगे, मैं वहां क्या करूंगा? नर्क में दुखी होंगे, तो मेरी जरूरत तो नर्क में पड़ेगी। मेरा चुनाव सिर्फ काम था — इसलिए मेरे अंदर यात्रा में डर नहीं था।
व्यापार, ज्योतिष और संन्यास
इसी तरीके से आगे बढ़ता रहा। फिर बिजनेस किया, व्यापार किया, लेकिन लगा कि बस वही नाम, शोहरत, पैसे की जिंदगी है। फिर ज्योतिष हुआ — उसमें भी देखा कि नाम, शोहरत, पैसा; मैंने कहा, इससे तो मैं भर गया हूं, यह कुछ है नहीं, इसके आगे भी कुछ है।
तो एक गुरु जी थे, वे मुझे गुरु-स्थान पर ले गए — मलाड में आश्रम था, बागेश्वरी आश्रम, उदासीन संप्रदाय, बड़ा अखाड़ा। मुझे लगा कि मैं संन्यासी हो जाता हूं, क्योंकि मुझे भगवान चाहिए, परमात्मा चाहिए। बदलना तो अंदर का था, बाहर का नहीं — लेकिन वहां से जुड़ने के लिए कपड़े बदलने पड़ते हैं, तो मैंने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया।
एक दिन, दो दिन, तीसरे दिन मैं आश्रम से चला गया — इसलिए कि जो नाम, शोहरत, पैसा मैं छोड़कर आया था, उसी के लिए यहां मारामारी हो रही थी। मेरा जम नहीं पाया।
इसी प्रसंग का छोटा रूप: JY-0001 (0HCUd_HZSA4)