प्रवचन PV01-0004 · भाग 1
या तो खोज के मरो, या खोज में मरो — मेहनत, नियम और योग्यता
5 अगस्त 2025 · नर्मदे हर तो बोलना ही पड़ेगा ...! आध्यात्मिक सत्संग ||योगीजी का सत्संग ||
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मुख्य बातें
- या तो खोज के मरो, या खोज में मरो — खोज लिया तो मरना ही नहीं, खोज में मरे तो अगला शरीर उसी खोज में मिलेगा।
- एक बार फैसला लेने के बाद डटे रहो, पीछे मत आओ।
- संत-महापुरुषों की उपलब्धि के बाद की बातें मत लो, उपलब्धि के पहले का जीवन देखो और वह जीना चालू करो।
- जो चाहिए, उसके सिस्टम और नियम में काम करना पड़ेगा — बैंक में बैलेंस नहीं डाला तो एटीएम से पैसा नहीं निकलेगा।
- योग्यता कोई किसी को दे नहीं सकता; आपको न कोई पहुंचा सकता है, न भटका सकता है — मार्ग बताया जा सकता है।
- गिड़गिड़ाओ मत, योग्य बनो, मेहनत करो — योग्य हो जाओगे तो गुरु आपके दरवाजे पे आ जाएगा।
या तो खोज के मरो, या खोज में मरो
या तो खोज के मरो, या खोज में मरो — खोजते-खोजते। जाना तो पक्का है। खोज के अगर मरे तो मरना नहीं होगा, क्योंकि खोज लिया; अब खोजने के लिए कुछ नहीं रहा, तो मरना कहां हुआ? अब तो जा रहे हो, क्योंकि खोज खत्म हो गई। खोज ही खत्म हो गई तो जन्म-मृत्यु खत्म।
और खोज में मरोगे तो कम से कम अगला शरीर मिलेगा तो उसी खोज में तो मिलेगा; शुरुआत ही खोज की रहेगी। लेकिन एक बार फैसला लेने के बाद डटे रहो, पीछे मत आओ। क्या होगा — मर जाएंगे; लेकिन कम से कम खोज में तो मरेंगे।
क्या आप कह सको कि मेरे प्रयास में कमी नहीं
क्या आप अपने आप से इतना बोल सको कि मेरे प्रयास में कमी नहीं? मैंने अपने तरीके से पूरी तरह, अथाह प्रयास किया; मेरा प्रयास पक्का रहा — पहुंचा, नहीं पहुंचा, मुझे नहीं पता, लेकिन मैंने प्रयास में कमी नहीं की। और प्रयास करोगे तो पहुंच ही जाओगे; जिन्होंने प्रयास किया, वो पहुंचे। आप क्या कर रहे हो? प्रयास की बातें कर रहे हो, प्रयास नहीं कर रहे हो।
उपलब्धि के पहले का जीवन देखो
हम क्या करते हैं — संत-महापुरुषों की उपलब्धि के बाद का जीवन ले लेते हैं, पिछला छोड़ देते हैं। उनकी मेहनत नहीं देखते कि उस तक पहुंचने के लिए उन्होंने अथाह मेहनत की, अनेक तरह की यातनाएं सहीं, भूख-प्यास बर्दाश्त की, अपमान सहे। हम बस उनके श्लोक ढूंढ रहे हैं। क्या उन शब्दों में कभी जीने का प्रयास किया?
उपलब्धि के बाद मत देखो, उपलब्धि के पहले देखो। उपलब्धि के पहले का जीवन देखोगे और वह जीवन जीना चालू करोगे तो उपलब्धि तक पहुंच जाओगे। उपलब्धि की बात ले लोगे तो उपलब्धि ही नहीं हो पाएगी, क्योंकि बात ले ली तो मेहनत क्यों करना? फिर क्या करोगे — गांव-गांव घूमकर लोगों को उनके श्लोक सुनाओगे? अपने भाव को प्रकट करने के लिए आपके पास अपने शब्द भी नहीं हैं, क्योंकि आपने उपलब्धि के बाद की बातें ले लीं; उपलब्धि कैसे हुई, वह नहीं लिया, क्योंकि उसमें मेहनत करनी पड़ेगी।
भगवान ने आपसे कहा क्या कि मेरी बातें करो, मुझे खोजो? आप ही तो सब बोल रहे हो। खोज तो हमारी है, और हम ही खोज रहे हैं। तो खोज रहे हो तो उस खोज में जो नियम है, उस नियम का पालन करना पड़ेगा।
जो चाहिए, उसी सिस्टम में चलना पड़ेगा
जिस विद्यालय में आपने एडमिशन लिया, नाम लिखाया, उस विद्यालय के पूरे नियमों का पालन करना पड़ेगा, तभी आपको वहां कुछ मिलेगा। आप कह रहे हो कि पढ़ना तो है, लेकिन नियम का पालन नहीं करूंगा, पूरा सिस्टम मेरे हिसाब से चलना चाहिए — ऐसा हो सकता है क्या?
नदी लांघनी है तो या तो आपको तैरना आता हो या नाव चाहिए; करोड़ों की कार लेकर किनारे खड़े रहोगे, सोचोगे पार कर लूंगा — नहीं कर पाओगे। रोड पर यात्रा करनी है तो नाव काम नहीं करेगी, चाहे लाखों की हो; आपकी साइकिल काम कर सकती है। तो आपको जो चाहिए, उसके नियम-सिस्टम में जिओगे तब जाकर उपलब्धि होगी।
एटीएम से पैसा चाहिए तो बैंक में पैसा डालो। बैंक में पैसा नहीं डाल रहे, जीरो बैलेंस है, और सोच रहे हो एटीएम से पैसा आ जाए, और लोगों को ताना मार रहे हो कि सब फ्रॉड है, सब गलत है। अरे भाई, तुम्हारे पास एटीएम है, बैलेंस नहीं है — क्यों नहीं समझ पा रहे हो, क्यों लोगों को दोष दे रहे हो? उसने मेहनत करके उसमें पैसा डाला है, और वह कहीं भी जाकर निकालकर उपयोग कर रहा है। जितना बैलेंस डालोगे, उतना कहीं भी निकाल सकते हो — यह व्यवस्था है। वैसे ही जिन्होंने स्वयं को पहचाना, स्वयं को जाना, स्वयं तक पहुंचे, जिन्हें भी आत्म-साक्षात्कार हुआ, उन्होंने अथाह मेहनत की है।
योग्यता कोई किसी को दे नहीं सकता
आपको पढ़कर कुछ बनना है तो मेहनत तो करनी पड़ेगी। आप बोलो कि मैं किताब ही नहीं पढ़ूंगा, ऐसे ही बन जाऊंगा — ऐसे तो नहीं बना जाएगा। काबिलियत कोई किसी को दे नहीं सकता, यह आपको खुद पैदा करनी पड़ेगी। सफलता किसी के बाप की बपौती नहीं है कि उठाया और आपको दे दिया। अगर किसी का बाप खुद प्रिंसिपल है, एक से लेकर पूरा कॉलेज तक उसका है, तो भी वह उसे योग्यता नहीं दे सकता; बहुत करेगा तो डिग्री दिला देगा, लेकिन डिग्री दिलाने से योग्यता थोड़ी आ जाएगी? जब प्रैक्टिकल काम करना होगा, तब क्या करेगा?
योग्यता देने की क्षमता किसी की नहीं है, वह आपकी है। एक ही आदमी है जो आपको भटका सकता है, वही पहुंचा सकता है — वह व्यक्तिगत आप हो। आपको न कोई पहुंचा सकता है, न भटका सकता है; हां, मार्ग बता सकता है। किसी से पूछोगे यहां शराब की दुकान कहां है, तो वह बता देगा; दूध की दुकान पूछोगे, तो वह भी बता देगा। अब आपको क्या पीना है, वह आप देखो।
यहां आपको योग्यता से मिलता है। दुकान पे गए — जो खरीदो, पैसा दो। अब बोलो कि पैसा नहीं है, मैं बहुत अच्छा, सज्जन इंसान हूं, मुझे दे दो — तो बहुत गिड़गिड़ाओगे तो बचा हुआ दे देगा, जो उसके काम का नहीं होगा, वह भी पुण्य के चक्कर में; ब्रांड चीज नहीं देगा। इसलिए गिड़गिड़ाओ मत कि कोई मुझे पहुंचा दे, कोई मेरे लिए कर दे।
योग्य हो जाओगे तो गुरु दरवाजे पे आ जाएगा
आप योग्य हो जाओगे तो आपके लिए कोई आकर कर देगा — प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है। जब तक तैयारी ही नहीं है, तब तक लाखों ला दो, पास आकर चले जाएंगे। तो रोओ मत, गिड़गिड़ाओ मत; योग्य बनो, मेहनत करो।
रामकृष्ण परमहंस जब उस लायक हुए तो तोतापुरी खुद पहुंच गए। बोले — हम तुम्हारे गुरु। रामकृष्ण बोले — मुझे गुरु की क्या जरूरत है, मेरे पास तो मां है। तो उन्होंने कहा — तेरी मां ने ही बुलाया है। वे मां से पूछने गए, तो मां ने कहा — हां बेटा, मैंने ही बुलाया है, मैं चाहती हूं कि तुझे मोक्ष हो जाए, उसे गुरु बना ले। तो आप योग्य हो जाओगे तो गुरु आपके दरवाजे पे आ जाएगा। लेकिन योग्य होगे तब ना; अयोग्यता में आप वह पाना चाहते हो, जिस लायक आप हो ही नहीं।
हम बिना मेहनत के पाना चाहते हैं, बस बातों से पाना चाहते हैं, करके नहीं। तो काम करो, जीवन में आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो। जो चाहिए, उसके लिए काम करो। और नहीं चाहिए, तो फिर बात ही क्यों कर रहे हो, समय क्यों बर्बाद कर रहे हो? कह रहे हो मुझे कुछ चाहिए भी नहीं, और पूछ रहे हो मिलेगा कैसे — ये दोनों बातें कैसे हो सकती हैं? सीधा-सीधा बोलिए कि मुझे चाहिए और कैसे मिलेगा; फिर वह मार्ग बता देगा, फिर उसके लिए काम करो। तो या तो खोज के मरो — खोज ही लिया तो बात खत्म, इस जगत से चले जाओगे; और खोज में मरोगे तो कम से कम अगला शरीर खोज में ही तो मिलेगा।