प्रवचन PV02-0015 · भाग 2
मैं जहां हूं, अपनी इच्छा से हूं — ईमानदारी से पूरी की गई इच्छा मुक्ति है, बेईमानी बंधन
22 अक्टूबर 2026 · अब देखना है कि तुम किसे महत्व देते हो #योगी
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मुख्य बातें
- अचानक से कुछ नहीं आता — कभी ना कभी मैंने उसकी प्रबल इच्छा की है और उस इच्छा के लिए काम किया है।
- मैं जहां हूं, जिसके बीच में हूं, जो भी कर रहा हूं — वो मेरी इच्छा थी; परमात्मा की वजह से नहीं, अपनी इच्छा से हूं।
- पहले जरूरतें इच्छा पैदा करवाती हैं, फिर मान-सम्मान, नाम-शोहरत, मौज-मस्ती के चक्कर में मैं इच्छा पैदा करता हूं; सामर्थ्य नहीं है तो उसके लिए काम करके योग्य बनता हूं।
- इच्छा को ईमानदारी से पूरा किया तो मुक्त हो गए, बेईमानी से पूरा किया तो बंधन में फंस गए — बस यही बात है।
- ईमानदारी में थोड़ा वक्त लगता है; बेईमानी, जिद और इमोशनल ब्लैकमेल से मिली चीज में देने वाले के अंदर से बद्दुआ निकलती है और लेने वाला भी खुश नहीं रहता।
अचानक से कुछ नहीं आता
लोग कहते हैं कि अचानक से देखो, मेरे पास ये कैसे आ गया। तो अचानक से नहीं आता। उसकी मैंने कभी प्रबल इच्छा की है। प्रबल इच्छा किया, और उस प्रबल इच्छा के लिए कहीं ना कहीं काम किया।
अगर मैं यह भी देखूं कि मैं जो अभी हूं, जहां पर हूं, जिसके बीच में हूं, जो भी कर रहा हूं — इसका मतलब वो मेरी इच्छा थी। ऐसे ही नहीं हो गया। ऐसे कुछ होता ही नहीं। जिसको हम ब्लेम करते हैं कि तेरे कारण मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई — ये कर्मभूमि है।
परमात्मा की वजह से नहीं, अपनी इच्छा से
कल वो डॉक्टर बोल रही थी कि सब परमात्मा — आज मैं यहां हूं तो परमात्मा की वजह से हूं। मैं बोला, ना ना, तुम अपनी इच्छा से हो। तुम अपनी इच्छा से हो, मैं अपनी इच्छा से हूं।
ये मिस्त्री लोग काम कर रहे हैं, अपनी इच्छा से। अगर अभी जाके इनसे बोल दो कि तुम काम तो कर रहे हो, पर तुम्हें पैसा नहीं मिलेगा — ये तुरंत उठेंगे और चले जाएंगे, और कहेंगे जितनी देर किया उतना दो। आप एक काम कर रहे हैं — आप यह मत सोचो कि इन्हें कुछ मिल रहा है; क्या तुम्हें यहां मिल रहा है? यहां कोई परमात्मा कुछ करने वाला नहीं है।
इच्छा, जरूरत और योग्यता
मैं जहां हूं, अपनी इच्छा से हूं। और मैंने उस इच्छा को पूरा करने के लिए अपने आप को योग्य बनाया, तब मैं वहां हूं। जब तक मैं योग्य नहीं होता, मेरी इच्छा होती है, लेकिन मैं वहां नहीं हूं।
तो पहले मैं इच्छा पैदा करता हूं। जरूरतें मेरी इच्छा पैदा करवाती हैं — पहले जरूरतें इच्छा पैदा करवाती हैं। फिर मान-सम्मान के चक्कर में, नाम-शोहरत, मौज-मस्ती के चक्कर में मैं इच्छा पैदा करता हूं।
अब इच्छा पैदा कर तो दी — या तो मैं तुरंत पूरा कर लूंगा, और अगर मेरी सामर्थ्य नहीं है, तो अब मैं उसके लिए काम करूंगा। और जब मैं सामर्थ्यवान हो जाऊंगा, तब मैं उसे पूरा कर लूंगा। तब जाकर मुझे शांति मिलेगी।
ईमानदारी मुक्ति, बेईमानी बंधन
अब यह देखना है कि आपने उस इच्छा को ईमानदारी से पूरा किया, तब तो मुक्त हो गए। और अगर आपने बेईमानी से पूरा किया, तो आप बंधन में फंस गए। बस यही बात है।
जिद से मिला तो बद्दुआ
हां, यही बात है — ईमानदारी में थोड़ा वक्त तो लगता है। बल्कि ज्यादा पचड़ा बेईमानी में हो जाता है — कि किसी तरह राइट क्लेम करते हो कि हमारा अधिकार है, या हम मरे जा रहे हैं; इमोशनल ब्लैकमेल कर दे, या और कुछ कर दे — तो तुम गिरते और हो।
मान लो उसे ऐसे मिल भी जाता — जैसे अगर वो आपसे जिद ही कर देती कि नहीं, आप जा ही रहे हो, आप देके ही जाओ — तो जिद में आप भी दे देते। लेकिन जिंदगी भर आपके अंदर से उसके लिए बद्दुआ निकलती। और वो लेके भी खुश नहीं रहती — जब यूज़ करके थक जाती, तब पछताती।