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प्रश्नोत्तर P11-0006 · भाग 11

हमारे अंदर ही परमात्मा है, आत्मा भी है और मन भी। अगर हम अपनी आत्मा को समझ गए, तो मन तो हट ही जाएगा; फिर हम और परमात्मा एक ही हो जाएंगे — क्या यह सही बात है?

परमात्मा ना पूरे ब्रह्मांड में है, ना तेरे अंदर है। "सर्वव्यापी" का मतलब — जैसे एक बल्ब से उजाला आया, तो उजाला सर्वव्याप्त है, बल्ब थोड़ी ना सर्वव्याप्त है। तो यह सृष्टि परमात्मा से है, इसलिए कहा गया है परमात्मा सर्वव्याप्त है; इसका मतलब यह थोड़ी ना कि परमात्मा मैले में भी है। यही भ्रांतियां हैं जो हमें लपेट के रखी हैं — कभी कहते हैं परमात्मा ढूंढने जा रहे हैं, कभी कहते हैं परमात्मा मेरे अंदर है, तो ढूंढ किसको रहे हो? अगर परमात्मा तेरे अंदर है, तो तू परमात्मा से भी ज्यादा ताकतवर होकर कैसे भटक गई? बाहर की चीजें तुझ पर काम कर गईं और परमात्मा की ऊर्जा तुझे बचा नहीं पाई? परमात्मा से सृष्टि है, सृष्टि से हम हैं। मैंने इस सृष्टि में आकर अपनी दुनिया बसा ली, और उसमें बहुत बेईमानी कर दी। अब अपनी दुनिया छोड़ के जब मैं परमात्मा की सृष्टि में आऊंगा, तो आत्मज्ञान होगा। फिर बचा यह पिंड; जब इस पिंड से मानसिक रूप से छूट जाऊंगा (मर जाऊंगा, ऐसा नहीं), तब ब्रह्म का ज्ञान हो जाएगा। यह यात्रा है।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 22 फरवरी 2026 #योगी · 2026-02-22