प्रश्नोत्तर P14-0040 · भाग 14
गुरु जी, कुछ गुरु कहते हैं ध्यान में बैठो, अंदर प्रकाश दिखेगा या कुछ सुनाई देगा, उसमें ध्यान लगाओ, फिर बुराइयां छोड़ दो तो निर्विकार हो जाओगे — क्या ऐसा होता है?
करके देख लो। विकार ध्यान से हुआ है कि कर्म से? विकार तो कर्म से हुआ है, तो कर्म का परोपकार करना पड़ेगा; ध्यान करने से बस कुछ नहीं हो जाएगा। उन्होंने जो बताया है वह कर लेना, नहीं समझ में आए तो मेरा अपना लेना — मैं जो भी मार्ग बताता हूं उसमें मैं नहीं हूं, मुझे ढूंढना नहीं पड़ेगा; शब्दों को अपना के आगे बढ़ जाओ, क्योंकि ये पिंड नश्वर है। भोजन कम करने से निर्विकार होने में सहायता मिलती है, लेकिन उसके बाद आत्म-चिंतन करो, सेवा करो, परोपकार करो। तप करोगे तो इंद्रियां कमजोर होंगी, भौतिकता के बारे में सोचना कम होगा, अपने आप आत्म-चिंतन होगा। मूल है निर्विकार होना — कैसे भी अपने आप को निर्विकार करा लो। आप ही अपने आप को पहुंचा सकते हो, चाहे भटका सकते हो; अगर कोई दूसरा पहुंचा देता तो महापुरुष सबको पहुंचा देते। दुनिया का सौभाग्यशाली व्यक्ति है जो अध्यात्म को समझता है, और समझने के बाद जो नहीं चलता वह दुनिया का दुर्भाग्यशाली व्यक्ति है।
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वीडियो: जीवन में तप का महत्व / #योगीजी_का_सत्संग #जीवन #तप #महत्व #satsang · 2024-08-05