प्रश्नोत्तर P14-0042 · भाग 14
गुरु जी, ध्यान में निर्विचार होना — क्या ये सही है? कभी बैठते हैं तो कोई विचार नहीं, बड़ा गजब का आनंद होता है, उठने का भी मन नहीं करता।
निर्विचार कैसे हो सकते हो? विचार नहीं चलेंगे तब तो खत्म। जैसे बस में यात्रा करते हुए झपकी लग जाती है और बहुत सुकून मिलता है — वह ये आनंद है, ये आपसे नहीं है। आप निर्विचार क्यों होना चाहते हो? जितने महात्मा हुए, भूख लगी तो भोजन का विचार आया तभी मांगे। विचारों से तकलीफ नहीं है; विचारों में राग-द्वेष हो रहा है, उससे तकलीफ है। विचार प्राकृतिक प्रक्रिया है, अपने आप आता है। और उस झलक को बार-बार लाना चाहते हो कि फिर आए — तो वो लालच हो गया, फिर आनंद कहां है? जब घटेगा तो पूरी तरह घटेगा; जैसे आदमी परसेंटेज-परसेंटेज नहीं मरता, एक साथ मरता है — या तो आनंद में हो या भौतिकता में।
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वीडियो: जीवन में तप का महत्व / #योगीजी_का_सत्संग #जीवन #तप #महत्व #satsang · 2024-08-05